पटना: कानों में छठ के मधुर गीत गुंजने लगे हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर में इसका माहौल दिखने लगा है। या फिर जो जहां है वहीं दीपावली के साथ-साथ छठ पूजा की तैयारी में जुटे हैं। ट्रेनों और हवाई जहाज में प्रवासियों की भीड़ बताने लगी है कि छठी मइया बुला रही हैं। और जब ‘मइया’ बुला दे तो कोई कहां रूकने वाला। रास्ते की लाख दुश्वारिया सहकर भी सिर्फ और सिर्फ अपना ‘वो’ वाला घर दिखता है, जहां बचपन गुजरा हो। ऐसे में मोबाइल में छठ सॉन्ग क्लिक हो ही जाता है, फिर तो पूरी दुनिया आंखों में बस जाती है।

दरअसल, छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि लगभग 3000 वर्षों से चली आ रही वैदिक सूर्य-उपासना की निरंतर धरोहर है। ऋग्वेद के सूर्य-सूक्तों और महाभारत काल में कर्ण-द्रौपदी की सूर्य आराधना के साक्ष्य इस प्राचीन परंपरा के धरोहर हैं। बिना किसी लिखित पांडुलिपि या जटिल कर्मकांडीय पुस्तकों के, इस अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का पूरा श्रेय भोजपुरी, मैथिली और मगही के पारंपरिक लोकगीतों को जाता है।

इन गीतों ने पूजा के हर एक नियम, स्वच्छता के कड़े मानकों, ‘कद्दू-भात’ से लेकर ‘उषा अर्घ्य’ तक के क्रम और इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक सामग्रियों (सूप, दउरा, ठेकुआ) के विवरण को अपनी काव्यात्मक पंक्तियों में पिरोकर रखा है। पीढ़ियों से गाए जा रहे ये मधुर लोकगीत इस वैदिक धरोहर को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं।

छठ पूजा की शुरुआत कब हुई थी?

ऐतिहासिक और पौराणिक शोधों के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत वैदिक काल (लगभग 1500 से 500 ईसा पूर्व) से मानी जाती है। ऋग्वेद में सूर्य और उषा (भोर) की आराधना के जो सूर्य-सूक्त मिलते हैं, वही कालांतर में छठ अनुष्ठान का मुख्य आधार बने। धार्मिक संदर्भों के अनुसार, इसका संबंध रामायण और महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि लंका विजय के बाद श्रीराम और सीता ने और महाभारत में सूर्यपुत्र कर्ण और द्रौपदी ने सूर्य देव की विशेष पूजा की थी। इतिहासकारों का मानना है कि मध्यकाल आते-आते ये वैदिक सूर्य-उपासना बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपनी क्षेत्रीय लोकपरंपराओं के साथ छठ के रूप में सुव्यवस्थित होकर स्थापित हुई।

छठ पूजा में लोकगीत क्यों गाए जाते हैं?

छठ पूजा में लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अनुष्ठान का अनिवार्य अंग हैं। ये गीत 36 घंटे के कठिन निर्जला व्रत के दौरान व्रतियों को मानसिक संबल और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं। लोकगीतों के माध्यम से पूजा की पूरी विधि, समय-सारणी और आवश्यक सामग्रियों का वर्णन पीढ़ियों से मौखिक रूप से स्थानांतरित होता रहा है।

इनमें सूर्य देव और छठी मैया के प्रति कृतज्ञता, परिवार की सुख-समृद्धि, और आरोग्य की कामना की जाती है। सामूहिक रूप से गाए जाने वाले ये गीत वातावरण को पवित्र बनाते हैं और समाज के सभी वर्गों को एक सूत्र में पिरोते हैं। प्राकृतिक संसाधनों और स्वच्छता के महत्व को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भी छठ पूजा में लोकगीतों का गायन अत्यंत आवश्यक माना गया है।

आस्था के साथ छठगीत का कनेक्शन कैसे बना?

छठगीत और आस्था का संबंध सदियों पुरानी मौखिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है। छठ पर्व में वैदिक मंत्रों के स्थान पर सरल लोकभाषा (भोजपुरी, मैथिली, मगही) में रचे गए गीतों को प्राथमिकता दी गई, जिससे ये आम जनमानस की सीधी आस्था का माध्यम बना।

इन गीतों में ईश्वर को किसी दूरस्थ शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य के रूप में संबोधित किया जाता है। जैसे- छठी मैया से संतान की रक्षा की गुहार या सूर्य देव से अर्घ्य स्वीकार करने की विनती। यह आत्मीयता और समर्पण ही छठगीतों को सीधे श्रद्धालुओं के हृदय से जोड़ता है। माँ अपने परिवार के कल्याण के लिए भावुक होकर गाती है, जिससे गीत और आस्था एक-दूसरे के पर्याय बन जाते हैं।

गीत गाने की सनातनी परंपरा क्या है?

सनातन परंपरा में ईश्वर की आराधना के नौ रूपों (नवधा भक्ति) में ‘कीर्तन’ और ‘गायन’ को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। सामवेद से लेकर भक्ति काल के संतों तक, ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए संगीत को सबसे सहज और प्रभावी माध्यम माना गया है।

सनातनी मान्यता के अनुसार, जब भावपूर्ण संगीत के साथ प्रार्थना की जाती है, तो भक्त का अहंकार समाप्त हो जाता है और वो सीधे ईश्वर से जुड़ पाता है। छठ पूजा इसी सनातनी परंपरा का जीवंत रूप है, जहां भक्त शास्त्रीय नियमों से परे हटकर अपनी मातृभाषा में सूर्य देव और छठी मैया की स्तुति करते हैं। संगीत के माध्यम से भगवान को मनाने की ये परंपरा आस्था को आनंद और भक्ति में बदल देती है।

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