शिलांग: मेघालय की प्रसिद्ध मावस्माई गुफा में मिली एक प्राकृतिक चूना-पत्थर संरचना (स्टैलेग्माइट) ने भारतीय मानसून के हजारों वर्षों पुराने रहस्यों से पर्दा उठाया है. वैज्ञानिकों ने इस स्टैलेग्माइट में संरक्षित लगभग 6,000 वर्षों के जलवायु रिकॉर्ड का अध्ययन कर पूर्वोत्तर भारत में मानसून की तीव्रता में आए बदलावों का पता लगाया है. शोध में यह भी सामने आया है कि मानसूनी पैटर्न केवल स्थानीय कारणों से नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु प्रणालियों और सूर्य की गतिविधियों से भी प्रभावित होते रहे हैं. यह अध्ययन मानसून के इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
IIT खड़गपुर और IISER कोलकाता के वैज्ञानिकों का अध्ययन
न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक यह स्टडी आईआईटी खड़गपुर के याचना वर्मा और प्रोफेसर अनिल के. गुप्ता के नेतृत्व में किया गया. शोध टीम में आईआईएसईआर कोलकाता के प्रसांता सान्याल के अलावा प्रियंतन गुप्ता, सोम दत्त, पंकज कुमार और अभिजीत मुखर्जी भी शामिल रहे. इस शोध में लगभग 11,807 वर्ष पहले से 5,622 वर्ष पहले तक भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून (ISM) में हुए बदलावों का विश्लेषण किया गया. अध्ययन इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल Palaeogeography, Palaeoclimatology, Palaeoecology में प्रकाशित हुआ है.
मावस्माई गुफा से मिला अहम सबूत
शोध का आधार मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स जिले में स्थित मावस्माई गुफा से प्राप्त एक स्टैलेग्माइट रहा. यह गुफा शिलांग से लगभग 60 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है. वैज्ञानिकों ने 11 सेंटीमीटर लंबे स्टैलेग्माइट सैंपल का अध्ययन किया, जिसे गुफा के भीतर लगभग 300 मीटर अंदर स्थित एक कक्ष से एकत्र किया गया था. उस स्थान पर आर्द्रता 95 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई थी.

गुफा के अंदर का नजारा
शुरुआती होलोसीन काल में मजबूत था मानसून
अध्ययन से पता चला कि लगभग 11,807 से 7,700 वर्ष पहले के बीच भारतीय मानसून काफी मजबूत था. वैज्ञानिकों ने स्टैलेग्माइट में मौजूद ऑक्सीजन समस्थानिकों (ऑक्सीजन आइसोटोप) का विश्लेषण किया, जिससे उस समय की वर्षा और मानसूनी गतिविधियों का अंदाजा लगाया गया. शोधकर्ताओं के अनुसार कम ऑक्सीजन आइसोटोप मान अधिक वर्षा और तीव्र मानसून का संकेत देते हैं. इससे स्पष्ट हुआ कि शुरुआती होलोसीन काल में मानसून बहुत सक्रिय था.
बाद के दौर में कमजोर पड़ने लगा मानसून
हालांकि 7,700 वर्ष पहले से 5,622 वर्ष पहले के बीच मानसूनी गतिविधियों में धीरे-धीरे कमजोरी आने लगी. इस अवधि में ऑक्सीजन आइसोटोप मान बढ़े हुए पाए गए, जो कम वर्षा और कमजोर मानसून का संकेत हैं. शोध में यह भी पाया गया कि मानसून की तीव्रता में सैकड़ों वर्षों के अंतराल पर कई बार उतार-चढ़ाव आए. इससे संकेत मिलता है कि पूर्वोत्तर भारत की जलवायु केवल स्थानीय परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती थी.

गुफा ने खोले बदलते मानसून के राज
अटलांटिक महासागर की घटनाओं से जुड़ाव
शोधकर्ताओं ने पाया कि मानसून में आए कई बदलाव उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र की जलवायु घटनाओं से मेल खाते हैं. इनमें बॉन्ड इवेंट 8, 7, 6, 5b, 5a और 4 शामिल हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) में होने वाले बदलावों का असर भारतीय मानसून पर भी पड़ सकता है. AMOC समुद्री धाराओं की एक महत्वपूर्ण प्रणाली है, जो अटलांटिक महासागर में ऊष्मा का परिवहन करती है.
सूर्य की गतिविधियों का भी मिला असर
अध्ययन में लगभग 118 और 110 वर्षों के अंतराल पर दोहराए जाने वाले जलवायु पैटर्न भी मिले. ये पैटर्न ग्लाइसबर्ग सौर चक्रों से मेल खाते हैं, जो सूर्य की दीर्घकालिक गतिविधियों में बदलाव से जुड़े होते हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार सौर गतिविधियों के साथ-साथ प्रशांत दशकिक दोलन (PDO), महासागर-वायुमंडल की परस्पर क्रियाएं तथा तिब्बती पठार और हिंद महासागर के बीच तापमान का अंतर भी मानसून को प्रभावित करता रहा है.
क्यों अहम है ये स्टडी?
वैज्ञानिकों के अनुसार भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून दक्षिण एशिया में जल संसाधनों, कृषि और करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. ऐसे में मानसून के ऐतिहासिक व्यवहार को समझना भविष्य की जलवायु चुनौतियों का आकलन करने में मदद कर सकता है. शोधकर्ताओं ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत अपनी भौगोलिक स्थिति और जलवायु संवेदनशीलता के कारण मानसून अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है. उन्होंने यह भी बताया कि पारंपरिक भू-रासायनिक विश्लेषण के साथ पेट्रोग्राफिक साक्ष्यों को जोड़ने से प्राचीन जलवायु को समझने का नया दृष्टिकोण मिला है. इस अध्ययन को पूरा करने में मेघालयन एडवेंचर एसोसिएशन, आईआईएसईआर कोलकाता और आईआईटी खड़गपुर ने महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया.



















