दीपावली से एक दिन पूर्व छोटी दिवाली पर नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है. इस बार ये पर्व 23 अक्टूबर 2022 को मनाया जाएगा. नरक चतुर्दशी नरक चौदस, नर्का पूजा के नाम से भी प्रसिद्ध है. नरक चतुर्दशी पर यमराज की विशेष उपासना की जाती है. मान्यता है कि नरक चतुर्दशी पर यमराज की पूजा से अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है.

पंडित इंद्रमणि घनस्याल बताते हैं कि नरक चतुर्दशी पर तर्पण और दीपदान का बड़ा महत्व होता है. इससे नरक की यातनाओं से मुक्ति प्राप्त होती है.

तर्पण और दीपदान का महत्व– शास्त्रों के अनुसार, नरक चतुर्दशी पर तर्पण और दीपदान की प्रथा है. नरक चतुर्दशी पर सुबह स्नान करने के बाद यमराज की विधि विधान से पूजन करने पर व्यक्ति सभी पापों से मुक्ति पाकर स्वर्ग को प्राप्त करता है. संध्या के समय यम का दीप जलाने का विधान है. इस दिन यम के नाम का दीपक जलाने से असमय मृत्यु से बचा जा सकता है. नरक चतुर्दशी पर तर्पण और दीपदान को लेकर एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है.

नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा-एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार रंति देव नामक राजा ने अज्ञातवश कोई पाप नहीं किया था. जब राजा की मृत्यु का समय निकट आया तो यमराज ने उनको दर्शन दिए. तब राजा ने यमराज ने पूछा कि मैंने कोई पाप नहीं किया तो आप मुझे लेने किसलिए आए हो, क्यों मुझे नरक जाना पड़ रहा है. तब यमदूत ने कहा कि हे राजन, एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था. उसी का कर्म का फल है. तब राजा ने यमराज से एक वर्ष और समय देने की विनती की.

यमराज ने उनकी बात स्वीकार ली. इसके बाद राजा ऋषियों के पास पहुंचे और इस पाप से मुक्ति के लिए समाधान पूछा. तब ऋषियों ने बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की नरक चतुर्दशी का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवाएं और अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करें. इसके बाद राजा ने नरक चतुर्दशी पर व्रत रखा और ब्रह्मणों को भोजन कराया.

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