राजराजेश्वरी मंदिर ,पावर हाउस भिलाई, जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़) में 11.04.2023 को छ ग रजक समाज कर्मचारी एवं व्यापारी कल्याण महासंघ द्वारा सत्र 2023-2024 की पहली मासिक बैठक आयोजित हुई जिसमें जो कार्यक्रम संत शिरोमणि गाडगे जी महाराज के जयंती के उपलक्ष में 19 मार्च 2023 हुआ था उस विषय पे समीक्षा बैठक हुई साथ ही में ज्योतिबा फूले जी की जयंती के उपलक्ष में छोटा सा कार्यक्रम किया गया एवं अंबेडकर जयंती भी समाज द्वारा मनाया जाएगा महात्मा ज्योतिबा फुले भारत के महान व्यक्तित्वों में से एक हैं। ये एक समाज सुधारक, लेखक, दार्शनिक, विचारक, क्रान्तिकारी के साथ अनन्य प्रतिभाओं के धनी थे। ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 ईo को तात्कालिक ब्रिटिश भारत के खानवाडी (पुणे) में हुआ था। इनकी माता का नाम चिमनाबाई और पिता का नाम गोविंदराव था। इनकी मात्र एक वर्ष की अवस्था में ही इनकी माता का स्वर्गवास हो गया। इसके बाद इनके पालन पोषण के लिए सगुणाबाई नामक एक दाई को लगाया गया। इन्हें महात्मा फुले और ज्यतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है। इनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से आकर यहाँ बसा था। यहाँ आकर इन्होंने फूलों का काम शुरू किया और उससे गजरा व माला इत्यादि बनाने का काम शुरू किया। इसलिए ये ‘फुले’ के नाम से जाने गए। इन्होंने प्रारंभ में मराठी भाषा में शिक्षा प्राप्त की। परन्तु बाद में जाति भेद के कारण बीच में ही इनकी पढ़ाई छूट गयी। बाद में 21 वर्ष की अवस्था में इन्होंने अंग्रेजी भाषा में मात्र 7 वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की। इनका विवाह सन् 1840 ईo में साबित्री बाई फुले से हुआ। ये बाद में स्वयं एक प्रसिद्ध स्वयंसेवी महिला के रूप में सामने आयीं। स्त्री शिक्षा और दलितों को शिक्षा का अधिकार दिलाने के अपने उद्देश्य में दोनों पति-पत्नी ने साथ मिलकर कार्य किया। शिक्षा के क्षेत्र में औपचारिक रूप से कुछ करने के उद्देश्य से इन्होने सन् 1848 ईo में एक स्कूल खोला। स्त्री शिक्षा और उनकी दशा सुधारने के क्षेत्र में यह पहला कदम था। परन्तु इसके बाद एक और समस्या आयी कि लड़कियों को पढ़ाने के लिए कोई शिक्षिका नहीं मिली। तब इन्होने दिन रात एक करके स्वयं यह कार्य किया और पत्नी सावित्री बाई फुले को इस काबिल बनाया। उनके इस कार्य में कुछ उच्च वर्ग के पितृसत्तात्मक विचारधारावादियों ने उनके कार्य में वाधा डालने की कोशिश की। परन्तु ज्योतिबा नहीं रुके तो उनके पिता पर दबाव दाल कर इन्हे पत्नी सहित घर से निकलवा दिया। इससे कुछ समय के लिए उनके कार्य व जीवन में वाधा जरूर आयी। परन्तु शीघ्र ही वे फिर अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो गए। इन्होने दलितों व महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक कार्य किये। 24 सितंबर 1873 ईo को इन्होंने महाराष्ट्र में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। इन्होने समाज के सभी वर्गों के लिए शिक्षा प्रदान किये जाने की मुखालफत की। ये भारतीय समाज में प्रचलित जाति व्यवस्था के घोर विरोधी थे। इन्होने समाज के जाति आधारित विभाजन का सदैव विरोध किया। इन्होंने जाति प्रथा को समाप्त करने के उद्देश्य से बिना पंडित के ही विवाह संस्कार प्रारंभ किया। इसके लिए बॉम्बे हाई कोर्ट से मान्यता भी प्राप्त की। इन्होंने बाल-विवाह का विरोध किया। ये विधवा पुनर्विवाह के समर्थक थे। ज्योतिबा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। ये उच्च कोटि के लेखक भी थे। इनके द्वारा लिखी गयी प्रमुख पुस्तकें निम्नलिखित हैं – गुलामगिरी (1873), क्षत्रपति शिवाजी, अछूतों की कैफियत, किसान का कोड़ा, तृतीय रत्न, राजा भोसला का पखड़ा इत्यादि। 1873 ईo में सत्य शोधक समाज की स्थापना के बाद इनके सामाजिक कार्यों की सराहना देश भर में होने लगी। इनकी समाजसेवा को देखते हुए मुंबई की एक विशाल सभा में 11 मई 1888 ईo को विट्ठलराव कृष्णाजी वंडेकर जी ने इन्हें महात्मा की उपाधि से सम्मानित किया। इनकी मृत्यु 28 नवंबर 1890 ईo को 63 वर्ष की अवस्था में पुणे (महाराष्ट्र) में हो गयी। आज के इस बैठक में मुख्य रूप से मनोज कुमार चौधरी (अध्यक्ष),मोतीलाल बैठा कोषाध्यक्ष , लाल बाबू बैठा जी सह कोषाध्यक्ष, श्याम लाल रजक उपाध्यक्ष , प्रेमलाल रजक संगठन मंत्री, शिवमंगल रजक शिव नाथ जी सलाहकार प्रेमचंद्र जी सलाहकार राम छबीला संस्कृतिक प्रभारी ,प्रेमचंद जी सलाहकार मछंदर प्रसाद सह सचिव,संतोष कुमार उपाध्यक्ष , साई रजक, राहुल रजक उपस्थित थे.

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