नरवा ,गरवा ,घुरवा ,बाडी का संरक्षण हमें, करना ही होगा
अमलेशवर – आज हमारे देश व समाज में अच्छे डॉ होने के साथ ही अच्छे किसान मित्र होना आज के समय में बहुत ही जरूरी है. आज हमारा पर्यावरण चक्र चारों तरफ से बहुत ही ज्यादा प्रदूषित व बदल चुका है खान पान रहन सहन एवंआचार विचार भी पहले से बदल चुका है. आज हमारे खाने पीने की सभी चीजें में रसायनिक तत्व पेस्टिसाइड घुस चुका हैआज हमारे किसान भाई आधुनिक नए नए तकनीकी से रसायनिक खाद फ़र्टिलाइज़र का प्रयोग करके अपने सभी फसलों का उत्पादन ज्यादा से ज्यादा लेने की होड़ सा मच गया है ,और इसके लिए वे भविष्य को ना देखते हुए अपने खेत खलियान में बेतहाशा रसायनिक तत्व का उपयोग करता है ,जिनके प्रभाव से जमीन भी कठोर व बंजर होने लगा हैं ,औरकुछ ही दिनों बाद जब हम ही उन्हीं चीजों से उत्पन्न खाद्यान्न चावल ,दाल ,गेहूँ सब्जी एवं फलों का सेवन करते हैं तो जो रसायनिक पेस्टिसाइड डाले रहते हैं ,उसका कुछ न कुछ मात्रा हमारे खाद्यान्न में मिला ही रहता है जिसके कारण से आज हम सब लोग ज्यादा से ज्यादा बीमार पड़ रहे हैं आज आदमी की औसत आयु भी बहुत ही कम 60 -65 हो चुका है ,खाने की सब्जी व फलो की स्थिति और बडी ही भयावह हैं ,सुबह दवाई डालकर शाम को ही सब्जी तोडकर बाजार ले चलते हैं या शाम को दवाई डालकर सुबह बेचने बाजार ले चलते हैं स्थिति यहाँ तक हैं कि उसे देखने वाला हमारा खाद्य विभाग की स्थिति शून्य सा हैं ,इसी तरह हमारे पीने का पानी, जो प्राकृतिक जल स्रोत है वह भी धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है.

आज हमारे चारों ओर जगह-जगह शौचालय के बनने से भी हमारे प्राकृतिक जलस्रोत कुआँ, बोर (ट्यूब वेल ) का पानी भी दूषित हो रहा है इसी तरह हम सब लोगों के द्वारा जो घरो में पानी का उपयोग किया जाता है वही गंदे पानी,जल को नाली के माध्यम से अपने प्राकृतिक जल स्रोत नदी ,नालों ,तालाबो में डाल रहे हैं और उसी पानी को फिर से रिसाइकल करके पुनः पी रहे हैं यह भी हमारे जीवन शैली को बहुत हद तक प्रभावित कर रहा है पहले के लोग नदी , झीलें ,कुओ एवं हैंडपंपों का भी जल को प्राकृतिक तरीके से पीते थे और अपनी जिंदगी लंबी आयु जी जाते थे लेकिन आज ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है आज हमारा जो खाने में फलों का बाजार है उसमें भी बेतहाशा कीटनाशक पेस्टिसाइड का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण से जो फल , फूल में हमारे शरीर को ताकत ,पौष्टिकता मिलनी चाहिए उसके बदले में और हमें हमारे शरीर को नुकसान कर रहा है आज हमारे किसान भाई फलो को मार्केट में लाने के पहले कच्चे रूप में तोड़ते हैं और उसे पकाने के लिए एथिलीन व कार्बेट जैसे हानिकारक रसायनिक तत्वों का उपयोग करते हैं और इन तत्वों का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करने से और उन्हीं फलों को हमे सेवन करने से भी हम लोगों के शरीर में भी दुष्प्रभाव पड़ता है आज अधिकांश व्यक्ति बीपी , शुगर ,पेट की समस्या ,गैस की समस्या , बवासीर, पाइल्स की समस्या से गुजर रहे हैं.

इसी तरह आज हमारे चारों तरफ कैंसर जैसे रोगों के लगातार मरीजो मे दिन प्रतिदिन वृद्धि हो रहा है इसलिए हम सब लोगों को अब अपने खानपान एवं जीवन शैली में परिवर्तन करना बहुत जरूरी है अब हम सब लोगों को किसान भाइयों को प्रेरित करना चाहिए ,निवेदन करना चाहिए कि आप लोग अपने खेतों में ज्यादा से ज्यादा रासायनिक दवाइयों के बदले में जैविक तरीके से ऑर्गेनिक खाद का उपयोग जरूर करें जिससे कि हमारे खाने पीने का जो खाद्यान्न फसल है उसमें रसायनिक हानिकारक तत्व की मात्रा कम से कम हो आज हमें नरवा, गरवा , घुरवा का जो अभियान है इस अभियान को हम सभी लोगों को स्वीकार करना ही चाहिए चाहे सरकार किसी भी दल का हो लेकिन नरवा ,गरवा, घूरवा ,बाडी की ओर हम सब लोगों को अब ज्यादा से ज्यादा इधर ध्यान देना ही होगा तभी हम लोग जैविक खेती की सपना को सकार कर सकते हैं ,और उससे होने वाले खाद्यान्न फसलों व फलो के सेवन से स्वस्थ व सुखी रह सकते हैं। एक अच्छे डाँ हमें जहाँ बीमारी होने पर हमे उचित चिकित्सा व सलाह से हमे ठीक कर सकता हैं, पर हमे हमारे देव तुल्य किसान हमे अपने जैविक फसलो के उत्पादन से हमे बीमार होने से ही बचा सकता हैं। उक्त बातें हमारे छ. ग. पर्यावरण मित्र समिति के अध्यक्ष डॉ अश्वनी साहू ने 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कोपल पब्लिक स्कूल अमलेशवर में विज्ञान सभा द्वारा आयोजित पर्यावरण संरक्षण व स्काई वाक कार्यक्रम में व्यक्त किये। सभा को छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा टीम से प्रोफेसर एम एल नायक, विश्वास मेश्राम, डाँ के बी बनसोडे ,डाँ लक्ष्मी काँत चावरे, अंजू मेश्राम, अजय कुमार कोल्हे, मार्शल ध्रुवे ने भी संबोधित किया सभी ने पर्यावरण संरक्षण पर अपनी बात रखते हुये साफ व स्वच्छ पर्यावरण के लिए प्लास्टिक का उपयोग अपने जीवन में कम से कम करने या न करने के लिए वैज्ञानिक पद्धति से उनसे होने वाले दुष्प्रभाव के बारे में विस्तार से चर्चा कर बताये.

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