महिला समूहों द्वारा 14 लाख रूपये से अधिक मूल्य की वर्मी कम्पोस्ट खाद तैयार की
रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार की सुराजी योजना नरवा, गरूवा, घुरवा, बाड़ी की सार्थकता धीरे-धीरे साकार होने लगी है। गांव में पशुधन के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निर्मित गौठान ग्रामीणों की आजीविका के केन्द्र का रूप लेने लगे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार के प्रोत्साहन के चलते गौठानों में महिला समूहों द्वारा बड़ी मात्रा में वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन किया जा रहा है। समूहों द्वारा गौठानों में उत्पादित वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग शासकीय नर्सरियों, पौधरोपण के साथ ही अब रेशम उत्पादन में उपयोगी पौधों के पोषण के लिए होने लगा है।
कोरबा जिले की सभी सरकारी नर्सरियों में विभिन्न प्रजातियों के फलदार पौधों को गौठानों में बनी कम्पोस्ट खाद से पोषण मिलने लगा है। वन विभाग द्वारा कराये जार हे वृक्षारोपण के साथ ही रेशम कीट को जीवित रखने के लिए लगाए जाने वाले पौधों के लिए भी वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग किया जाने लगा है। जिले के 74 गौठानों में अभी कम्पोस्ट खाद बनाने का काम जारी है। गौठानों में बनी इस खाद को उद्यानिकी, वन, कृषि के साथ-साथ रेशम विभाग भी खरीद रहा है। नगरीय निकायों में वृक्षारोपण और पार्कों के पौधों के संपोषण के लिए भी इसी वर्मी खाद का उपयोग किया जा रहा है। खास बात यह है कि कम्पोस्ट खाद कहीं बाहर से नहीं मंगाई गई है, बल्कि इसका उत्पादन छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा गांव में स्थापित गोठानों में हुआ है। जरूरत के अनुसार शासकीय विभाग अब बीज निगम से जैविक खाद की खरीदी करने के बजाए स्थानीय स्तर पर ही महिला स्वसहायता समूहों से वर्मी खाद की खरीदी करने लगे हैं।

कोरबा विकासखंड के बासीन गांव में बने गोठान का संचालन करने वाले उजाला स्व सहायता समूह की अध्यक्ष सितारा बेगम कहती है कि गौठान में गोबर-कचरे से खाद बनाने लागत कम है। 40-45 दिन में खाद तैयार हो जाती है। उसे निकालकर, छानकर पैकिंग करते हैं, फिर नौ रूपये साठ पैसे किलो में बेचते हैं। कचरे की सफाई के साथ-साथ कम समय में ही अच्छी-खासी कमाई भी हो जाती है। समूह की सचिव मीरा बाई बताती हैं कि महिला समूह द्वारा गोठानों में उपलब्ध गोबर और पेड़-पौधों के पत्तों तथा वानस्पतिक कचरे को वर्मी बेड में भरकर खाद तैयार किया जाता है। वर्मी बेड में भरे कचरे में केचुए डालकर उसे जैविक खाद में बदल दिया जाता है। इसमें किसी कैमिकल का उपयोग नहीं होता। ऐसी जेैविक खाद सब्जियों के साथ-साथ फलों और अन्य फसलों के लिए भी उपयोगी होती है। जिले में महिला समूहों द्वारा बनाई गई इस खाद की दिन प्रतिदिन मांग बढ़ती जा रही हैं।


















