• चन्द्रभूषण वर्मा
    दिल्ली सहित हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड में हुए हाल में भारी बारिश ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में जहां बादल फटने की कई घटनाएं हुईं, तो पूरा शहर बाढ़ की चपेट में आ गया। कहीं सड़कें बह गई तो कहीं पुल बह गया। वहीं दिल्ली की बात करें तो दिल्ली में बारिश और बाढ़ ने पिछले 45 सालों का रिकार्ड तोड़ दिया। यहां यमुना का जलस्तर काफी तेजी से बढऩे लगा और नदियों के किनारे बसे लोगों को वहां से हटा कर सुरक्षित जगहों पर ले जाया गया। दिल्ली में यमुना का जल स्तर बढऩे से देश की राजधानी भी जलमग्न हो गई।
    तात्कालिक तौर पर कह सकते हैं कि अतिवृष्टि से लबालब यमुना इस संकट की वजह है। लेकिन यदि हम इस संकट का दूसरा पहलू देखें तो राष्ट्रीय राजधानी में जल निकासी का सिस्टम बाढ़ व बारिश के पानी के सामने लाचार नजर आया है। बाढ़ के मुद्दे पर दिल्ली की आप सरकार और भाजपा के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों की बाढ़ आई हुई है। लेकिन किसी ने इस बात की जिम्मेदारी लेने की कोशिश नहीं की कि समय रहते दिल्ली की ड्रेनेज व सीवर लाइन को अतिवृष्टि से मुकाबले के लिये क्यों तैयार नहीं किया गया है। वहीं कभी नहीं सोचा गया कि यदि यमुना में पांच दशक बाद बाढ़ आएगी तो अतिरिक्त जल निकासी का कोई कारगर तंत्र तैयार किया जाए। देश में प्रतिभावान इंजीनियरों की कमी नहीं है लेकिन राजनेताओं की तरफ से कोई ईमानदार पहल होती नजर नहीं आती। ऐसे वक्त में जब ग्लोबल वार्मिंग संकट के चलते बारिश के पैटर्न में बदलाव आया है और कम समय में ज्यादा तेज बारिश होती है, हमें अविलंब जल निकासी के लिये नई रणनीति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सवाल दिल्ली का ही नहीं है, देश के अन्य महानगरों मसलन चेन्नई, मुंबई और बंगलूरू में पिछले कुछ वर्षों में ज्यादा बारिश से जो भयावह संकट उपजा था, वह आने वाले समय में देश के हर शहर के लिये खतरा बन सकता है।
    दरअसल, अंधे विकास ने उन तमाम खाली स्थानों को भर दिया है जहां स्थित तालाबों-नालों में बारिश का पानी निकलकर लोगों को जल भराव से बचाता था। कमोबेश देश के तमाम छोटे-बड़े शहर जलभराव के संकट से जूझ रहे हैं। निस्संदेह, दिल्ली का संकट नीति-नियंताओं के लिये चेतावनी है कि यदि निरंतर बढ़ती शहरी आबादी के दबाव के अनुसार जल निकासी की वैज्ञानिक तरीके से व्यवस्था नहीं की गई तो जलभराव का संकट लगातार गहरा होता जायेगा।
    वहीं शहरों में जल भराव की बात करें तो हम अपने आसपास सिर्फ ऊंची-ऊंची बड़ी-बड़ी इमारतें ही देखते हैं। हमने पानी के प्राकृतिक बहाव वाले स्रोतों को पाट दिया है। इसलिए पानी अपने बहाव का रास्ता अपने-आप बना रही है और वो शहरों की तरफ जा रही है। निचली बस्तियों में लगातार जल स्तर बढ़ रहा है। जिससे वहां के रहने वाले लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यदि समय रहते हमने प्राकृतिक जल स्रोतों के सही रख-रखाव व ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए उनके निदान के लिए पर्याप्त उपाय नहीं किए तो यह समय के साथ काफी विकराल होते जाएगा। इसलिए बाढ़ में जल निकासी के लिए एक बेहतरीन कार्ययोजना बनाकर उस पर ईमानदारी से कार्य करने की जरूरत है, तभी हमारा शहर बाढ़ के पानी से जलमग्न नहीं हो
    पाएगा।
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