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प्रचलित मान्यता के अनुसार यह त्योहार हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के मारे जाने की स्मृति में मनाया जाता है। पुराणों में वर्णित है कि हिरण्यकशिपु की बहन होलिका वरदान के प्रभाव से नित्य अग्नि स्नान करती थी और जलती नहीं थी। हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करने को कहा। उसने समझा कि ऐसा करने से प्रह्लाद अग्नि में जल जाएगा तथा होलिका बच जाएगी। होलिका ने ऐसा ही किया, किंतु होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गए। होलिका को यह स्मरण ही नहीं रहा कि अग्नि स्नान वह अकेले ही कर सकती है। तभी से इस त्योहार के मनाने की प्रथा चल पड़ी।

होलिका दहन

होलिका दहन पूर्ण चंद्रमा (फाल्गुन पूर्णिमा) के दिन ही प्रारंभ होता है। इस दिन सायंकाल को होली जलाई जाती है। इसके एक माह पूर्व अर्थात माघ पूर्णिमा को एरंड या गूलर वृक्ष की टहनी को गांव के बाहर किसी स्थान पर गाड़ दिया जाता है और उस पर लकडिय़ां, सूखे उपले, खर-पतवार आदि चारों ओर से एकत्र किया जाता है और फाल्गुन पूर्णिमा की रात या सायंकाल इसे जलाया जाता है। परंपरा के अनुसार सभी लोग अलाव के चारों ओर एकत्रित होते हैं। इसी अलाव को होली कहा जाता है। होली की अग्नि में सूखी पत्तियां, टहनियां व सूखी लकडिय़ां डाली जाती हैं तथा लोग इसी अग्नि के चारों ओर नृत्य व संगीत का आनंद लेते हैं।

होली और राधा-कृष्ण की कथा

भगवान श्रीकृष्ण तो सांवले थे, परंतु उनकी आत्मिक सखी राधा गौर वर्ण की थी। इसलिए बालकृष्ण प्रकृति के इस अन्याय की शिकायत अपनी मां यशोदा से करते तथा इसका कारण जानने का प्रयत्न करते। एक दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को यह सुझाव दिया कि वे राधा के मुख पर वही रंग लगा दें जिसकी उन्हें इच्छा हो। नटखट श्रीकृष्ण यही कार्य करने चल पड़े। यह प्रेममयी शरारत शीघ्र ही लोगों में प्रचलित हो गई तथा होली की परंपरा के रूप में स्थापित हुई। इसी ऋतु में लोग राधा व कृष्ण के चित्रों को सजाकर सडक़ों पर घूमते हैं। मथुरा की होली का विशेष महत्त्व है क्योंकि मथुरा में ही कृष्ण का जन्म हुआ था।

स्वादिष्ट व्यंजन

मिष्ठान इस पर्व की विशेषता है। उत्तर भारत में आप गुझिया का आनंद ले सकते हैं व पश्चिम में महाराष्ट्र में पूरनपोली का। कई जगह ठंडाई भी बनाई जाती है, परंतु इस मिश्रण से सावधान ही रहना चाहिए क्योंकि यह पेय होली पर प्राय: सभी जगह बनाया व वितरित किया जाता है। इसका नशा शीघ्र उतरता नहीं और भूख बढ़ती ही जाती है। इसके पीने से दिमाग पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रेम का त्योहार

होली बसंत व प्रेम-प्रणव का पर्व है तथा धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक है। यह रंगों का, हास-परिहास का भी पर्व है। यह वह त्योहार है जिसमें लोग ‘क्या करना है’ तथा ‘क्या नहीं करना’ के जाल से अलग होकर स्वयं को स्वतंत्र महसूस करते हैं। यह वह पर्व है जिसमें आप पूर्ण रूप से स्वच्छंद हो अपनी पसंद का कार्य करते हैं, चाहे यह किसी को छेडऩा हो या अजनबी के साथ भी थोड़ी शरारत करनी हो। इन सबका सर्वोत्तम रूप यह है कि सभी कटुता, क्रोध व ‘बुरा न मानो होली है’ की ऊंची ध्वनि में डूबकर घुल-मिल जाते हैं। ‘बुरा न मानो होली है’ की करतल ध्वनि होली की लंबी परंपरा का अभिन्न अंग है।

होली की प्राचीन कथाएं

एक कहानी यह भी है कि कंस के निर्देश पर जब राक्षसी पूतना ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए उनको विषपूर्ण दुग्धपान कराना शुरू किया तो श्रीकृष्ण ने दूध पीते-पीते उसे ही मार डाला। कहते हैं कि उसका शरीर भी लुप्त हो गया तो गांव वालों ने पूतना का पुतला बना कर दहन किया और खुशियां मनाई। तभी से मथुरा में होली मनाने की परंपरा है। एक अन्य मुख्य धारणा है कि हिमालय पुत्री पार्वती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं। चूंकि शंकर जी तपस्या में लीन थे, इसलिए कामदेव पार्वती की मदद के लिए आए। कामदेव ने अपना प्रेमबाण चलाया जिससे भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई। शिवशंकर ने क्रोध में आकर अपना तीसरा नेत्र खोल दिया जिससे भगवान शिव की क्रोधाग्नि में जलकर कामदेव भस्म हो गए। फिर शंकर जी की नजर पार्वती जी पर गई। शिवजी ने पार्वती जी को अपनी पत्नी बना लिया और शिव जी को पति के रूप में पाने की पार्वती जी की आराधना सफल हो गई। होली की अग्नि में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर सच्चे प्रेम की विजय के रूप में यह त्योहार विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है। मनुस्मृति में इसी दिन मनु के जन्म का उल्लेख है। कहा जाता है कि मनु ही इस पृथ्वी पर आने वाले सर्वप्रथम मानव थे। इसी दिन नर-नारायण के जन्म का भी वर्णन है जिन्हें भगवान विष्णु का चौथा अवतार माना जाता है। सतयुग में भविष्योतरापूरन नगर में छोटे से लेकर बड़ों को सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियां लग गईं। वहां के लोग इसे द्युंधा नाम की राक्षसी का प्रभाव मान रहे थे। इससे रक्षा के लिए वे लोग आग के पास रहते थे। सामान्य तौर पर मौसम परिवर्तन के समय लोगों को इस तरह की बीमारियां हो जाती हैं, जिसमें अग्नि राहत पहुंचाती है। शामी का पेड़, जिसे अग्नि-शक्ति का प्रतीक माना गया था, उसे जलाया गया और अगले दिन सत्ययुगीन राजा रघु ने होली मनाई। इस तरह हम देखते हैं कि होली विभिन्न युगों में तरह-तरह से और अनेक नामों से मनाई गई और आज भी मनाई जा रही है। इस तरह कह सकते हैं कि असत्य पर सत्य की या बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी के रूप में होली मनाई जाती है। इसके रंगों में रंग कर हम तमाम खुशियों को आत्मसात कर लेते हैं।

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