ऐसा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही कर सकती हैं। अतीत की कई घटनाएं उनकी हरकतों और राजनीति की साक्षी रही हैं। स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत में कदाचित यह पहली बार हुआ है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी प्रमुख केंद्रीय जांच एजेंसी छापा मारे और वहां की मुख्यमंत्री महत्वपूर्ण फाइलें, दस्तावेज और अन्य साक्ष्य उठा कर चल दे। यह कानूनी अपराध भी है और ममता इसे भली-भांति जानती भी हैं। ईडी ने ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ (आई-पैक) के सह-संस्थापक प्रतीक जैन के घर और दफ्तर पर छापे की कार्रवाई की थी। कोलकाता में 6 और दिल्ली में 4 ठिकानों पर एक ही दिन में छापे मारे गए थे। यह सूचना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक पहुंची, तो हडक़ंप मच गया, क्योंकि प्रतीक जैन सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के आईटी प्रकोष्ठ के मुखिया भी हैं। बेशक आई-पैक की स्थापना प्रशांत किशोर ने की थी, लेकिन उन्होंने अब एक राजनीतिक दल बना कर बिहार से राजनीति शुरू कर दी है और उनके उम्मीदवार चुनाव मैदान में भी उतरे थे। अब आई-पैक के प्रथम निदेशक प्रतीक जैन हैं। वह ममता के राजदार और चुनावी रणनीतिकार भी हैं, लिहाजा छापेमारी की सूचना के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार के साथ, पहले प्रतीक के घर गईं और फिर दोपहर में तीन घंटे आई-पैक के दफ्तर में रहीं। जब बाहर आकर वह मीडिया से मुखातिब हुईं, तो उनके हाथ में हरे रंग की एक फाइल थी। उन्होंने फाइल को अपने सीने से मजबूती के साथ लगाया हुआ था। मुख्यमंत्री ने चुनाव से पहले केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के मद्देनजर केंद्र सरकार को कोसा। खासकर गृहमंत्री अमित शाह के लिए कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया।
ममता पहले भी गृहमंत्री को ‘दुर्योधन’ और ‘दुशासन’ करार दे चुकी हैं। ममता का बुनियादी आरोप था कि उनकी पार्टी की चुनावी रणनीति, उम्मीदवारों के विवरण, बूथवार रणनीति को लूटने के लिए यह छापेमारी कराई गई है। आखिर ईडी किसी भी पार्टी की राजनीतिक, चुनावी रणनीति जानने को छापे क्यों मारेगा? यह उसका संवैधानिक जनादेश नहीं है। ईडी मनी लॉन्ड्रिंग, आर्थिक घोटालों, हवाला, काला धन आदि की ही जांच करता है। राजनीति के औसतन मात्र 2-3 फीसदी ही मामले होते हैं, जिनमें ईडी दखल देकर जांच करता है और अदालत में आरोप-पत्र दाखिल करता है। यदि ईडी की छापेमारी की सजा-दर बेहद कम है, तो उसकी जवाबदेही अदालत की होनी चाहिए, क्योंकि सजा अदालतें ही तय करती हैं। आखिर ममता बनर्जी की उस हरी फाइल में क्या सूचनाएं, रहस्य, ब्यौरे बंद थे कि उस फाइल को कब्जाने, मुख्यमंत्री होने के बावजूद, वह प्रतीक जैन के घर और दफ्तर तक पहुंच गईं? चुनावी रणनीति के आरोप बेमानी हैं, क्योंकि जमीनी स्तर पर सक्रिय राजनीतिक दल अपने प्रतिद्वंद्वियों की रणनीति और संभावित उम्मीदवारों की जानकारी रखते हैं। चूंकि ईडी ने 2020 के कोयला घोटाले एवं तस्करी के संदर्भ में आई-पैक और प्रतीक जैन पर छापेमारी की थी, लिहाजा उस फाइल में हवाला लेन-देन, मनी लॉन्ड्रिंग, पार्टी के चंदे, पैसा वितरण का रिकॉर्ड आदि की जानकारियां हो सकती हैं। यह आरोप ईडी का भी है, जिसने कोलकाता उच्च न्यायालय में याचिका दी है।














