तिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप अश्लील हैं कि उन्होंने और उनके शिष्य ने दो नाबालिग शिष्यों का यौन शोषण किया। जो आशुतोष ब्रह्मचारी नामक कथित साधु ने अदालत में शिकायत दर्ज की थी, वह भी एक और संन्यासी, कथित जगद्गुरु रामभद्राचार्य का शिष्य बताया जा रहा है। अदालत में जज के सामने धारा 164 के तहत नाबालिग शोषितों के बयान भी दर्ज करा दिए गए हैं। पॉक्सो की विशेष अदालत ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच करने के आदेश दिए हैं। चूंकि मामला पॉक्सो का है, लिहाजा बेहद संवेदनशील है। क्या शंकराचार्य को जेल भी भेजा जा सकता है? यदि ऐसा हुआ, तो बड़ा धार्मिक वज्रपात होगा, क्योंकि शंकराचार्य कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि सनातन के शिखर-पुरुष हैं, सर्वोच्च धर्मगुरुओं में शामिल हैं। जिस साधु-संत के असंख्य श्रद्धालु हैं, उप्र के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जिन्हें ‘भगवान’ मान कर प्रणाम करते हैं, एक और उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, शंकराचार्य के ही, बटुकों की शिखा खींचने को ‘महापाप’ करार देते हैं और अपने आवास पर बटुकों का सम्मान करते हैं, उसी शख्स के शंकराचार्य होने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सवाल उठाए थे। आश्चर्य है कि उप्र में यह क्या हो रहा है? हिंदुत्व और सनातन की कट्टर समर्थक, पैरोकार भाजपा की सरकार में सनातन-पुरुष पर ही घमासान क्यों मचा है?

जो अभी तक शंकराचार्य हैं, जिनके पदनाम पर सर्वोच्च अदालत ने अभी तक कोई फैसला नहीं सुनाया है, जो शंकराचार्य सनातन के शिखर संतों में एक हैं और आदि शंकराचार्य की प्रतिमूर्ति हैं, उन्हें ही दुराचारी और बलात्कारी करार क्यों दिया जा रहा है? इन आरोपों की तुलना आसाराम बापू के केस से नहीं की जा सकती, क्योंकि उसमें बलात्कार की निरंतर पीडि़ता नाबालिग कन्या के परिजनों ने भी शिकायतें दर्ज कराई थीं। मीडिया के सामने आकर दुष्कर्म-कथा सुनाई थी। आसाराम को ‘भगवान’ मानने वालों की भी कमी नहीं थी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक उनके ‘भक्त’ थे। मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी की आस्था, श्रद्धा भी उनके प्रति थी। आसाराम कई सालों से जेल में हैं। बीते दिनों स्वास्थ्य आधार पर उन्हें अंतरिम जमानत दी गई थी। क्या शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद भी यौनाचारी हैं अथवा शंकराचार्य पद की लड़ाई यौन शोषण तक मोड़ दी गई है? देश के तीन और शंकराचार्य तथा बड़े मठाधीश साधु-संत, महामंडलेश्वर और समूचे अखाड़े खामोश क्यों हैं? यह प्रहार किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि सनातन धर्मगुरु पर किया गया है। यह पारदर्शी और स्पष्ट होना चाहिए। यदि आरोप फर्जी और बेबुनियाद हैं, तो शिकायतकर्ता को नहीं बख्शना चाहिए। सवाल है कि पीडि़त नाबालिगों के माता-पिता कहां हैं और उनके बयान सामने क्यों नहीं आए हैं? ऐसा लगता है कि यह लड़ाई शंकराचार्य और रामभद्राचार्य सरीखे साधुओं के दरमियान है, क्योंकि दोनों ही एक-दूसरे पर बयान-कीचड़ फेंक रहे हैं। क्या साधु-संन्यासी होने के बाद भी ऐसी खुन्नस, ईष्र्या, विद्वेष के भाव रहने चाहिए? लानत है। दरअसल यौन शोषण को एक मुद्दा बना लिया गया है। महाकुंभ के दौरान तो सरकार इसी शंकराचार्य के पांव में पलक-पांवड़े बिछा रही थी। माघ मेले के दौरान शंकराचार्य और उप्र प्रशासन के बीच विवाद पैदा किए गए। उसी का निष्कर्ष यौन शोषण का आरोप लगता है। दरअसल जिस कथित महाराज ने शंकराचार्य पर यौनाचार के आरोप लगाए हैं, उनका अपना जीवन आपराधिक रहा है। उस पर 21 केस या तो अदालत के विचाराधीन हैं अथवा कुछ निपट गए हैं।

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