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कहा जाता है कि जब रोम जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था। वैसा ही दृश्य हाल में अमरीका में दिखा, जब मध्य पूर्व की जंग की आग में झुलसती दुनिया से बेपरवाह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प निवेशकों को संबोधित करने के बाद अपनी बालकनी  में डांस कर रहे थे। समझौता वार्ता जारी होने के दावों के बीच भी ट्रम्प द्वारा ईरान को धमकाना जारी है, तो इसराईल-अमरीका और ईरान के बीच जंग भी कमजोर तो हरगिज नहीं पड़ी। बदलते बयानों और दावों के पीछे का खेल तो ट्रम्प ही बेहतर जानते होंगे, पर युद्ध जिस तरह और अधिक आक्रामक हो रहा है, वह वैश्विक स्थिरता और शांति, खासकर ऊर्जा सुरक्षा के लिए चुनौतियों के और दुष्कर होने का ही संकेत है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों, खासकर तेल और गैस के लिए आयात पर ही ज्यादा निर्भर है। इसलिए संकट विकराल होना ही है। अब केंद्र सरकार ने पैट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती जैसी जो संवेदनशीलता दिखाई है, वैसी इसराईल-अमरीका और ईरान युद्ध शुरू होने के सप्ताह भर में ही घरेलू सिलैंडर 55 रुपए और कमॢशयल सिलैंडर 115 रुपए महंगा करते समय नहीं दिखी।

पैट्रोल पंपों और गैस एजैंसियों पर भीड़ अफवाह जनित आशंकाओं का भी परिणाम मान लें, तो रसोई गैस बुकिंग की अंतराल अवधि बढ़ाने, कमर्शियल गैस की आपूर्ति कम करने और हवाई किराए की अधिकतम सीमा हटाने जैसे सरकार के कई फैसले यही बता रहे हैं कि भारत ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ा है। निजी तेल कंपनी नियारा एनर्जी ने तो दाम बढ़ा भी दिए हैं। अनुभव बताता है कि सरकारी तेल कंपनियां भी मूल्य वृद्धि के लिए 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न होने का ही इंतजार कर रही हैं। एल.पी.जी. उत्पादन बढ़ाने के दावे राहत देते हैं, पर सवाल अनुत्तरित है कि उत्पादन बढ़ाने की क्षमता थी तो उसके लिए संकटकाल की प्रतीक्षा क्यों? स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के बावजूद वहां से भारत के जहाजों का निकलना तथा ऊर्जा आपूर्ति स्रोतों का विस्तार राहतकारी है लेकिन खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए कि इससे हम संभावित वैश्विक ऊर्जा संकट से बच जाएंगे। हमें आत्ममुग्धता से उबर कर चुनौतियों से निपटने की तैयारियां करनी चाहिएं। 

तेल और गैस आपूर्ति का संकट बहुआयामी है, जिसका असर छोटे उद्योगों से ले कर खाद्य सुरक्षा तक पड़ सकता है। मझोले और छोटे उद्योग बंद होने तथा परिणामस्वरूप प्रवासी श्रमिकों के पलायन की खबरें आने भी लगी हैं। इस सबसे नागरिकों का जीवन-यापन तो दुश्वार हो ही जाएगा, हमारी अर्थव्यवस्था और विकास दर पर भी बेहद नकारात्मक असर पड़ेगा। अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करने वाले भारत के लिए संकट की गंभीरता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए। आपूर्ति स्रोतों के विस्तार के जरिए जरूरत के मुताबिक आयात सुनिश्चित भी कर लें तो सवाल है क्या डेढ़ गुनी या दो गुनी कीमत पर पैट्रोल-डीजल या रसोई गैस खरीदने की क्रय शक्ति हमारे नागरिकों की है? डॉलर के मुकाबले हर रोज रसातल में जा रहा रुपया  मुश्किलें बढ़ाएगा ही। ईरान और रूस से ही हमें डॅालर में भुगतान किए बिना कच्चे तेल के आयात की सुविधा मिलती रही है।

इस आसन्न संकट के लिए इसराईल-अमरीका और ईरान के अलावा शायद ही कोई और जिम्मेदार हो लेकिन प्रभाव से कोई देश बच नहीं पाएगा। इसीलिए जानकार इस संकट की तुलना 1973 और 1979 के ऐतिहासिक ऊर्जा संकट से कर रहे हैं। उन दोनों अभूतपूर्व ऊर्जा संकट के बीज भी मध्य-पूर्व में ही बोए गए थे। 6 अक्तूबर 1973 को मिस्र और सीरिया ने इसराईल पर हमला किया, जिसके बाद अमरीका ने इसराईल को सैन्य सहायता दी। अरब-इसराईल युद्ध में इसराईली सेना को पुन: आपूर्ति करने तथा युद्धोत्तर शांति वार्ता में लाभ प्राप्त करने की अमरीकी कवायद के प्रतिशोधस्वरूप ही पैट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ‘ओपेक’ के सदस्य अरब देशों ने अमरीका के विरुद्ध प्रतिबंध लगा दिए। अक्तूबर, 1973 से जनवरी, 1974 तक चले उस तेल संकट के बीच कच्चे तेल की कीमतें 3 से 4 गुना तक बढ़ गई थीं, जिसका परिणाम ईंधन की कमी और आॢथक मंदी के रूप में सामने आया था। 

दूसरा वैश्विक ऊर्जा संकट ईरान में इस्लामिक क्रांति के चलते 1979 में उत्पन्न हुआ था, जब तेल उत्पादन में कमी आई। हालांकि उसके चलते वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति में मात्र 4 प्रतिशत की ही कमी आई, लेकिन बाजार ने साल भर में कच्चे तेल की कीमतों में 2 गुना तक वृद्धि कर दी। 1980 में ईरान-ईराक युद्ध के चलते दोनों ही देशों के तेल उत्पादन में कमी आई, जिसका परिणाम वैश्विक आर्थिक मंदी के रूप में सामने आया। उसके बाद ही वेनेजुएला, नाइजीरिया और मैक्सिको जैसे तेल निर्यातक देशों ने अपना उत्पादन बढ़ाया तथा सोवियत संघ बड़ा तेल उत्पादक बन कर उभरा। 

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजैंसी के क्रमबद्ध तरीके से 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने के फैसले से ऊर्जा संकट से निपटने में बड़ी मदद भले ही न मिले, लेकिन पैट्रोल-डीजल की खपत कम करने के लिए उसके सुझाव उपयोगी साबित हो सकते हैं। मसलन, यथासंभव वर्क फ्रॉम होम लागू किया जाए, निजी वाहनों की बजाय सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल ज्यादा किया जाए, कार पूलिंग को बढ़ावा दिया जाए, हाइवे पर गाडिय़ों की रफ्तार 10 किलोमीटर प्रति घंटा घटाई जाए, खाना पकाने में बिजली से चलने वाले उपकरणों का उपयोग बढ़ाया जाए। दरअसल अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर भारत सरीखे देश में तो इन उपायों को जीवन शैली और कार्य संस्कृति का ही हिस्सा बनाए जाने की जरूरत है।-राज कुमार सिंह

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