राष्ट्रपति टं्रप अपने ही देश में बुरी तरह घिर गए हैं। उनके खिलाफ ‘नो किंग्स’ बैनर वाले विरोध-प्रदर्शन किए जा रहे हैं। सांसद भी सडक़ों पर उतर आए हैं। अमरीका के 50 राज्यों में 3500 से अधिक स्थानों पर करीब 80 लाख लोग सडक़ों पर आक्रोशित हैं और राष्ट्रपति टं्रप का इस्तीफा मांग रहे हैं। ये विरोध-प्रदर्शन टं्रप के अधिनायकवाद के खिलाफ हैं और ब्रिटेन, यूरोप तक फैल गए हैं। ईरान पर हमला अमरीका और इजरायल के शासनाध्यक्षों का तानाशाही किस्म का रवैया था। उनके तमाम मंसूबे अधूरे रहे हैं। युद्ध को एक महीना बीत चुका है। लगभग पूरी दुनिया हिल चुकी है। संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी का सर्वेक्षण है कि ईरान युद्ध से 4.5 करोड़ से अधिक लोग ‘भुखमरी’ के कगार पर हैं। अनुमानित डाटा है कि युद्ध में अभी तक 4500 से अधिक मौतें हो चुकी हैं, करीब 10 लाख लोग बेघर हो चुके हैं, वैश्विक जीडीपी के 2 फीसदी नीचे आने के खतरे सामने हैं। यदि अमरीका और इजरायल में जनता टं्रप और नेतन्याहू का आक्रामक विरोध कर रही है, तो बिल्कुल लोकतांत्रिक कदम है। अमरीका सबसे प्राचीन लोकतंत्र है। बल्कि विरोध इतना तीखा और सटीक होना चाहिए कि दोनों नेता इस्तीफा देने को विवश हो जाएं। दोनों देशों के नेता ‘कब्जेबाज’ हैं, लिहाजा युद्ध को माध्यम बनाए हुए हैं। दोनों देशों में चुनाव होने हैं और वे निम्नतम लोकप्रियता के स्तर पर हैं। पेंटागन का आकलन है कि एक माह के युद्ध में ही अमरीका का करीब 30,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। आर्थिक विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ईरान का भी 15-20 लाख करोड़ रुपए और खाड़ी देशों का करीब 2.5 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। राष्ट्रपति टं्रप अब भी विमानवाहक युद्धपोत, मरीन कमांडो, सैनिक, विमान आदि ईरान की ओर भेज रहे हैं। बॉम्बर्स से बमबारी करवा रहे हैं। ईरान को ‘कब्रिस्तान’ बना दिया है। अब जमीनी युद्ध की भी संभावनाएं हैं।

अमरीका और इजरायल ने एक माह की अवधि में ईरान पर 10,000 से अधिक हमले (प्रति) कर उसके 66 फीसदी सैन्य ठिकानों को नष्ट कर दिया है। आखिर मिसाइल, ड्रोन कितने बचे होंगे? और ईरान कब तक उनके सहारे युद्ध लड़ता रहेगा? यह बेहद चिंतित सवाल है। ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि युद्ध से विश्व के सामने ऊर्जा-संकट पैदा हो गया है, जो लगातार गहराता जा रहा है। मुद्रास्फीति और सप्लाई चेन की अवरुद्धता ने दुनिया को झटके दिए हैं। टं्रप की इस तानाशाही और वैश्विक गुंडागर्दी को क्यों सहन किया जा रहा है? यूरोप, एशिया (भारत, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया आदि समेत), अफ्रीका, लैटिन अमरीका और जो देश ईरान युद्ध से पिसे, कुचले जा रहे हैं, वे संयुक्त राष्ट्र में जाएं और टं्रप के खिलाफ आंदोलन करें। अब प्रस्ताव पारित कराने का वक्त निकल चुका है। देशों को आक्रामक होना होगा, लेकिन अहिंसक आंदोलन करना होगा। यह कूटनीति या राजनीति अथवा अमरीका के साथ संबंधों वक्त नहीं है, बल्कि विश्व के अस्तित्व का सवाल है। विरोध देश का नहीं, राष्ट्रपति टं्रप का करना है। भारतीय विशेषज्ञ मान रहे हैं कि हमारी तेल-गैस की आपूर्ति लगातार कम हो रही है और खपत जस की तस है। हमारी जरूरत 20 की है, लेकिन सप्लाई 10 की ही हो रही है। साफ है कि कमी बढ़ती रहेगी, तो अंतत: एक विकराल संकट सामने खड़ा हो सकता है। चूंकि खाड़ी देशों में तेल-गैस ठिकानों को व्यापक स्तर पर तबाह किया गया है, आग ने सब कुछ खाक कर दिया है, लिहाजा यह तय है कि आगामी 4-5 साल तक आपूर्ति वैसी नहीं रहेगी, जैसी युद्ध से पहले थी। भारत के लिए मध्य-पूर्व ही सबसे मुफीद क्षेत्र है, जहां से तेल-गैस का आयात 2-4 दिन में ही संभव है। अन्य देश हमसे बहुत दूर हैं और सप्लाई में 40-45 दिन लग जाते हैं। भारत जितना विशाल, विराट देश है, उतनी ही हमारी जरूरतें हैं। तेल-गैस के बजाय बिजली वाले वाहनों को ज्यादा सार्वजनिक बनाया जाए।

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