खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव और LPG सप्लाई को लेकर बनती अनिश्चितता के बीच IIT बॉम्बे ने एक ऐसा समाधान पेश किया है, जो न सिर्फ सस्ता है बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहद फायदेमंद है. संस्थान ने सूखे पत्तों और जैविक कचरे से किचन का ईंधन बनाने की पेटेंट तकनीक विकसित की है. करीब 10 साल की रिसर्च के बाद तैयार इस तकनीक ने कैंपस को LPG पर निर्भरता से काफी हद तक आजाद कर दिया है.

आसान भाषा में समझें तो यह तकनीक ‘कचरे से ऊर्जा’ बनाने का तरीका है. कैंपस में गिरने वाले सूखे पत्ते, टहनियां, लकड़ी के छोटे टुकड़े और भूसा, इन सबको पहले छोटे-छोटे पेलट्स में बदला जाता है.

इसके बाद इन पेलट्स को एक खास मशीन, यानी बायोमास गैसीफायर में डाला जाता है. यहां इन्हें सीधे जलाया नहीं जाता, बल्कि एक खास प्रक्रिया से गैस और भाप में बदला जाता है. इसी भाप का इस्तेमाल कैंटीन में खाना बनाने के लिए किया जाता है. सीधे शब्दों में कहें तो जो कचरा पहले फेंक दिया जाता था, वही अब किचन का ईंधन बन गया है.

कैंपस का कचरा अब बन रहा ऊर्जा का स्रोत

IIT बॉम्बे का कैंपस करीब 550 एकड़ में फैला हुआ है और यहां 50,000 से ज्यादा पेड़-पौधे हैं. हर दिन बड़ी मात्रा में सूखे पत्ते और जैविक कचरा निकलता था, जिसे हटाने में खर्च भी होता था. अब यही कचरा एक संसाधन बन गया है. पहले जहां इसे साफ करने में पैसा लगता था, अब वही कचरा ऊर्जा बनाकर पैसे बचा रहा है.

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत साल 2014 में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संजय महाजनी के नेतृत्व में हुई. उनके साथ डॉ. सुजीत देवरे और डॉ. प्रबोध गडकरी की टीम जुड़ी. शुरुआत आसान नहीं थी. मशीन से ज्यादा धुआं निकलता था, तकनीकी समस्याएं आती थीं और किचन स्टाफ भी इस नए सिस्टम को लेकर थोड़ा डरा हुआ था.

सबसे बड़ी समस्या क्लिंकर थी, एक ठोस अवशेष जो मशीन को जाम कर देता था. लेकिन टीम ने हार नहीं मानी और लगातार सुधार करते रहे. 2017 में इस समस्या को काफी हद तक हल कर लिया गया.

बाद में एनर्जी साइंस विभाग के प्रोफेसर संदीप कुमार भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े और उन्होंने बेहतर बर्नर डिजाइन किया. कई सालों तक परीक्षण के बाद 2024 में इसे कैंपस की स्टाफ कैंटीन में सफलतापूर्वक लागू कर दिया गया.

कितना फायदा मिल रहा है?

इस तकनीक का असर अब साफ दिखने लगा है. कैंटीन में LPG की खपत 30–40% तक कम हो गई है.  गैस लीकेज या ब्लास्ट जैसी घटनाओं का खतरा लगभग खत्म हो गया है. इससे प्रदूषण भी बेहद कम हो गया है. कचरे के निपटान का खर्च बचा रहा है.  यानि यह तकनीक एक साथ कई समस्याओं का समाधान दे रही है. खर्च भी कम और पर्यावरण भी सुरक्षित.

पर्यावरण के लिए भी खास

आज के समय में सबसे बड़ी चिंता प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन है. यह तकनीक दोनों पर असर डालती है. अनुमान है कि इस मॉडल से हर साल करीब 300 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम हो सकता है. साथ ही लगभग 90 टन LPG की बचत भी संभव है. इससे साफ है कि यह सिर्फ एक किचन तकनीक नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम है.

IIT बॉम्बे अब इस तकनीक को सिर्फ कैंटीन तक सीमित नहीं रखना चाहता. योजना है कि इसे हॉस्टल मेस और बड़े किचन तक फैलाया जाए. संस्थान का अनुमान है कि इससे हर साल करीब 50 लाख रुपये की बचत हो सकती है. इस तकनीक का लाइसेंस इनफिक्सेन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया है, जिससे इसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सके.

देश के लिए अहम है यह मॉडल

आज जब LPG की कीमतें और सप्लाई दोनों अनिश्चित हो रही हैं, ऐसे में यह मॉडल देश के लिए एक मजबूत विकल्प बन सकता है. यह तकनीक दिखाती है कि अगर सही सोच और रिसर्च हो, तो कचरा भी एक बड़ा संसाधन बन सकता है. 

IIT बॉम्बे का यह “लिविंग लैब” मॉडल अब सिर्फ एक कैंपस तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय में शहरों, उद्योगों और बड़े किचन के लिए भी गेम चेंजर साबित हो सकता है. IIT बॉम्बे की यह पहल सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम है.

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