अब भारत का ध्यान सेवाओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने पर होना चाहिए। एआई जैसे उच्च स्तरीय क्षेत्रों में निवेश, मजबूत डिजिटल अधोसंरचना, और नियामक बाधाओं को बहुपक्षीय प्रयासों के माध्यम से आसान बनाना होगा, जो सीमाओं के पार सेवा निर्यात को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकें…

हाल ही में वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने अपनी रिपोर्ट मई 2026 में कहा कि भारत उभरते बाजारों में 2020 के बाद से सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बना हुआ है। भारत के बड़े विदेशी मुद्रा भंडार और आर्थिक सुधारों ने तमाम आर्थिक तूफानों व भूराजनीतिक संकटों के बीच भी भारत को आगे बढ़ाया है। साथ ही भविष्य में भारत के और तेजी से आगे बढऩे की संभावनाएं उभरकर दिखाई दे रही हैं। उल्लेखनीय है कि 9 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पांच राज्यों के ताजा विधानसभा चुनावों के नतीजे देश में राजनीतिक स्थिरता व लोकतंत्र की मजबूती के लिए शुभ संकेत हैं और इससे आर्थिक रफ्तार को और तेज करने की दिशा में नई संभावनाएं पैदा होंगी। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि ताजा चुनाव नतीजे देश में आर्थिक नीतिगत स्थिरता, घरेलू बाजार की मजबूती, नई पीढ़ी के सुधार, क्षेत्रीय आर्थिक विकास तथा राष्ट्रीय परियोजनाओं के तेज क्रियान्वयन को गति देते हुए दिखाई देंगे। साथ ही देश के पूर्वी राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर तालमेल से सुधार और विकास की नीतियां तेजी से लागू होंगी। गौरतलब है कि भारत में राजनीतिक स्थिरता के परिदृश्य से भारत पर दुनिया का आर्थिक भरोसा लगातार बढ़ता जा रहा है। अब भारत में देशी-विदेशी निवेश बढऩे के साथ विदेश व्यापार और सेवा निर्यात का ग्राफ भी तेजी से बढ़ते हुए दिखाई देगा। यह बात महत्वपूर्ण है कि वैश्विक चुनौतियों और पश्चिम एशिया संकट के बीच वर्ष 2026 में दुनिया में भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश बना रहेगा। हाल ही में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट अप्रैल 2026 के अनुसार वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच वर्ष 2026 में 6.5 प्रतिशत विकास दर के साथ भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती विकास दर वाला देश बना रहेगा।

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और विश्व बैंक ने भी भारत के लिए ऐसे ही तेज विकास दर के अनुमान प्रस्तुत किए हैं। अब देश में देशी-विदेशी निवेश बढऩे की संभावनाएं बढ़ेंगी। पिछले दिनों 30 अप्रैल को उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के सचिव ने कहा कि नीतिगत सुधारों और आपूर्ति श्रृंखला में बदलावों की मदद से वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आंकड़़ा 90 अरब डॉलर के पार जा सकता है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था के मद्देनजर दुनिया के विकसित और विकासशील देश तेजी से भारत के साथ कारोबार बढ़ाने के मद्देनजर आगे बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस समय दुनिया में आकार ले रही नई विश्व अर्थव्यवस्था भारत की ओर झुकी हुई है। पहले अधिकांश अंतरराष्ट्रीय आर्थिक-व्यापारिक टिप्पणियों में कहा जाता था कि भारत ने मौका गंवा दिया, लेकिन अब दुनिया भर के देशों का मानना है कि अगर वे आर्थिक रूप से तेजी से बढ़ते हुए भारत के साथ नहीं जुड़ पाए तो वे महत्वपूर्ण मौका गंवा देंगे। नि:संदेह भारत के लिए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के माध्यम से निर्यात के नए बाजारों में दस्तक देने की संभावनाएं तेज होंगी। पिछले दिनों 27 अप्रैल को भारत और न्यूजीलैंड के बीच एक ऐतिहासिक एफटीए हुआ है। न्यूजीलैंड के साथ किए गए इस एफटीए का अत्यधिक मजबूत पक्ष भारत से सेवा निर्यात बढ़ाना और भारत से पेशेवरों को न्यूजीलैंड में अच्छे अवसरों के लिए आगे बढ़ाना भी है। यह भी महत्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष 2025 में भारत के द्वारा ब्रिटेन और ओमान के साथ किए गए एफटीए का भी इसी वर्ष 2026 में आगामी महीनों में कार्यान्वयन शुरू होगा। साथ ही भारत-यूरोपीय संघ एफटीए का क्रियान्वयन भी इसी वर्ष संभावित है। अब मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ऑस्ट्रेलिया और चार यूरोपीय देशों आइसलैंड, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टाइन के समूह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (एफ्टा) के साथ सफलतापूर्वक कार्यान्वित हो रहे एफटीए के और अधिक लाभ मिलते हुए दिखाई देंगे। इतना ही नहीं, कनाडा, इजरायल, रूस, पेरू, चिली, दक्षिण अफ्रीका और मेक्सिको के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर काम में तेजी आएगी। यह बात ध्यान रखी जानी होगी कि अभी अमरीका के साथ व्यापार वार्ता में जल्दबाजी नहीं की जाए।

अमरीका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय ने राष्ट्रपति डानोल्ड ट्रंप द्वारा व्यापार अधिनियम 1974 की धारा 122 के तहत लगाया गया 10 प्रतिशत वैश्विक शुल्क 8 मई को रद्द कर दिया। यह फैसला 20 फरवरी को टैरिफ लागू होने के 50 दिनों से भी कम समय में आया है। इस फैसले से अमरीका के शुल्क को लेकर अनिश्चितता और बढ़ सकती है, जिससे भारत और अमरीका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के निष्कर्ष पर असर पड़ सकता है। ऐसे में भारत को अमरीका के अधिक स्थिर और कानूनी रूप से विश्वसनीय व्यापार प्रणाली विकसित करने तक बीटीए पर अंतिम फैसले को लेकर इंतजार करना चाहिए। अमरीकी शुल्क नीति को लेकर लगातार अनिश्चितता, ट्रंप प्रशासन के शुल्क के फैसलों को अदालत द्वारा बार बार रद्द किए जाने से भारत के किसी भी दीर्घकालीन व्यापार प्रतिबद्धता को उचित ठहराना मुश्किल हो जाएगा। इस समय अमरीका भी अपने मानक मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) के तहत शुल्क कम करने को तैयार नहीं है, जबकि वह भारत से अधिकांश क्षेत्रों में शुल्क कम या समाप्त करने की अपेक्षा कर रहा है। ऐसी परिस्थितियों में किसी भी व्यापार समझौते के एकतरफा होने का जोखिम है, जिसमें भारत को बिना किसी सार्थक टैरिफ लाभ के बदले स्थायी बाजार पहुंच रियायतें देनी होंगी। निश्चित रूप से अब व्यापार समझौतों और निर्यात के नए बाजारों के कारण भारत का सेवा निर्यात भी बढ़ेगा। दुनिया में इस समय अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के नवीनतम विश्व आर्थिक परिदृश्य में प्रकाशित सेवा निर्यात से संबंधित अध्ययन रिपोर्ट भी रेखांकित हो रही है। इसमें कहा गया है कि हाल के दशकों में भारत से सेवाओं का निर्यात वस्तुओं की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ा है। ये ऐसी सेवाएं हंै जिन्हें बिना भौतिक निकटता के सीमाओं के पार पहुंचाना आसान है। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्लाउड कंप्यूटिंग और रिमोट वर्क ने कई सेवाओं को व्यापार योग्य बना दिया है। जैसे-जैसे दूरी का महत्त्व कम होता जा रहा है और डिजिटल व्यापार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे भारत से सेवाओं का निर्यात बढ़ रहा है।

निश्चित रूप से भारत की आर्थिक ताकत को और तेजी से बढ़ाने के लिए हमें बहुआयामी दृष्टिकोण के साथ कई बातों पर ध्यान देना होगा। अब अल्पकालिक वृद्धि के पीछे भागने के बजाय, भारत को मध्यम अवधि की राजकोषीय और बाह्य स्थिरता को सुरक्षित रखना होगा। लंबे समय से लंबित सुधारों को आगे बढ़ाना होगा। अब भारत का ध्यान सेवाओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने पर होना चाहिए। एआई जैसे उच्च स्तरीय क्षेत्रों में निवेश, मजबूत डिजिटल अधोसंरचना, और नियामक बाधाओं को बहुपक्षीय प्रयासों के माध्यम से आसान बनाना होगा, जो सीमाओं के पार सेवा निर्यात को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकें। इस बात की ओर भी ध्यान देना होगा कि भारत का जो निर्यात कुछ ही बाजारों और कुछ ही देशों तक सीमित है, उसे विभिन्न अधिक वस्तुओं और विभिन्न अधिक देशों तक विस्तारित किया जाए। इन सबके साथ-साथ बुनियादी ढांचा, निवेश अनुकूल वातावरण, श्रम सुधार, नवीनीकरण ऊर्जा आदि को ध्यान में रखकर भारत दुनिया का और अधिक आर्थिक भरोसा बढ़ा सकेगा। साथ ही भारत 2047 तक विकसित भारत बनने की राह पर भी आगे बढ़ते हुए दिखाई दे सकेगा।-डा. जयंती लाल भंडारी

अब भारत का ध्यान सेवाओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने पर होना चाहिए। एआई जैसे उच्च स्तरीय क्षेत्रों में निवेश, मजबूत डिजिटल अधोसंरचना, और नियामक बाधाओं को बहुपक्षीय प्रयासों के माध्यम से आसान बनाना होगा, जो सीमाओं के पार सेवा निर्यात को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकें…

हाल ही में वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने अपनी रिपोर्ट मई 2026 में कहा कि भारत उभरते बाजारों में 2020 के बाद से सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बना हुआ है। भारत के बड़े विदेशी मुद्रा भंडार और आर्थिक सुधारों ने तमाम आर्थिक तूफानों व भूराजनीतिक संकटों के बीच भी भारत को आगे बढ़ाया है। साथ ही भविष्य में भारत के और तेजी से आगे बढऩे की संभावनाएं उभरकर दिखाई दे रही हैं। उल्लेखनीय है कि 9 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पांच राज्यों के ताजा विधानसभा चुनावों के नतीजे देश में राजनीतिक स्थिरता व लोकतंत्र की मजबूती के लिए शुभ संकेत हैं और इससे आर्थिक रफ्तार को और तेज करने की दिशा में नई संभावनाएं पैदा होंगी। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि ताजा चुनाव नतीजे देश में आर्थिक नीतिगत स्थिरता, घरेलू बाजार की मजबूती, नई पीढ़ी के सुधार, क्षेत्रीय आर्थिक विकास तथा राष्ट्रीय परियोजनाओं के तेज क्रियान्वयन को गति देते हुए दिखाई देंगे। साथ ही देश के पूर्वी राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर तालमेल से सुधार और विकास की नीतियां तेजी से लागू होंगी। गौरतलब है कि भारत में राजनीतिक स्थिरता के परिदृश्य से भारत पर दुनिया का आर्थिक भरोसा लगातार बढ़ता जा रहा है। अब भारत में देशी-विदेशी निवेश बढऩे के साथ विदेश व्यापार और सेवा निर्यात का ग्राफ भी तेजी से बढ़ते हुए दिखाई देगा। यह बात महत्वपूर्ण है कि वैश्विक चुनौतियों और पश्चिम एशिया संकट के बीच वर्ष 2026 में दुनिया में भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश बना रहेगा। हाल ही में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट अप्रैल 2026 के अनुसार वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच वर्ष 2026 में 6.5 प्रतिशत विकास दर के साथ भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती विकास दर वाला देश बना रहेगा।

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संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और विश्व बैंक ने भी भारत के लिए ऐसे ही तेज विकास दर के अनुमान प्रस्तुत किए हैं। अब देश में देशी-विदेशी निवेश बढऩे की संभावनाएं बढ़ेंगी। पिछले दिनों 30 अप्रैल को उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के सचिव ने कहा कि नीतिगत सुधारों और आपूर्ति श्रृंखला में बदलावों की मदद से वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आंकड़़ा 90 अरब डॉलर के पार जा सकता है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था के मद्देनजर दुनिया के विकसित और विकासशील देश तेजी से भारत के साथ कारोबार बढ़ाने के मद्देनजर आगे बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस समय दुनिया में आकार ले रही नई विश्व अर्थव्यवस्था भारत की ओर झुकी हुई है। पहले अधिकांश अंतरराष्ट्रीय आर्थिक-व्यापारिक टिप्पणियों में कहा जाता था कि भारत ने मौका गंवा दिया, लेकिन अब दुनिया भर के देशों का मानना है कि अगर वे आर्थिक रूप से तेजी से बढ़ते हुए भारत के साथ नहीं जुड़ पाए तो वे महत्वपूर्ण मौका गंवा देंगे। नि:संदेह भारत के लिए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के माध्यम से निर्यात के नए बाजारों में दस्तक देने की संभावनाएं तेज होंगी। पिछले दिनों 27 अप्रैल को भारत और न्यूजीलैंड के बीच एक ऐतिहासिक एफटीए हुआ है। न्यूजीलैंड के साथ किए गए इस एफटीए का अत्यधिक मजबूत पक्ष भारत से सेवा निर्यात बढ़ाना और भारत से पेशेवरों को न्यूजीलैंड में अच्छे अवसरों के लिए आगे बढ़ाना भी है। यह भी महत्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष 2025 में भारत के द्वारा ब्रिटेन और ओमान के साथ किए गए एफटीए का भी इसी वर्ष 2026 में आगामी महीनों में कार्यान्वयन शुरू होगा। साथ ही भारत-यूरोपीय संघ एफटीए का क्रियान्वयन भी इसी वर्ष संभावित है। अब मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ऑस्ट्रेलिया और चार यूरोपीय देशों आइसलैंड, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टाइन के समूह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (एफ्टा) के साथ सफलतापूर्वक कार्यान्वित हो रहे एफटीए के और अधिक लाभ मिलते हुए दिखाई देंगे। इतना ही नहीं, कनाडा, इजरायल, रूस, पेरू, चिली, दक्षिण अफ्रीका और मेक्सिको के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर काम में तेजी आएगी। यह बात ध्यान रखी जानी होगी कि अभी अमरीका के साथ व्यापार वार्ता में जल्दबाजी नहीं की जाए।

अमरीका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय ने राष्ट्रपति डानोल्ड ट्रंप द्वारा व्यापार अधिनियम 1974 की धारा 122 के तहत लगाया गया 10 प्रतिशत वैश्विक शुल्क 8 मई को रद्द कर दिया। यह फैसला 20 फरवरी को टैरिफ लागू होने के 50 दिनों से भी कम समय में आया है। इस फैसले से अमरीका के शुल्क को लेकर अनिश्चितता और बढ़ सकती है, जिससे भारत और अमरीका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के निष्कर्ष पर असर पड़ सकता है। ऐसे में भारत को अमरीका के अधिक स्थिर और कानूनी रूप से विश्वसनीय व्यापार प्रणाली विकसित करने तक बीटीए पर अंतिम फैसले को लेकर इंतजार करना चाहिए। अमरीकी शुल्क नीति को लेकर लगातार अनिश्चितता, ट्रंप प्रशासन के शुल्क के फैसलों को अदालत द्वारा बार बार रद्द किए जाने से भारत के किसी भी दीर्घकालीन व्यापार प्रतिबद्धता को उचित ठहराना मुश्किल हो जाएगा। इस समय अमरीका भी अपने मानक मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) के तहत शुल्क कम करने को तैयार नहीं है, जबकि वह भारत से अधिकांश क्षेत्रों में शुल्क कम या समाप्त करने की अपेक्षा कर रहा है। ऐसी परिस्थितियों में किसी भी व्यापार समझौते के एकतरफा होने का जोखिम है, जिसमें भारत को बिना किसी सार्थक टैरिफ लाभ के बदले स्थायी बाजार पहुंच रियायतें देनी होंगी। निश्चित रूप से अब व्यापार समझौतों और निर्यात के नए बाजारों के कारण भारत का सेवा निर्यात भी बढ़ेगा। दुनिया में इस समय अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के नवीनतम विश्व आर्थिक परिदृश्य में प्रकाशित सेवा निर्यात से संबंधित अध्ययन रिपोर्ट भी रेखांकित हो रही है। इसमें कहा गया है कि हाल के दशकों में भारत से सेवाओं का निर्यात वस्तुओं की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ा है। ये ऐसी सेवाएं हंै जिन्हें बिना भौतिक निकटता के सीमाओं के पार पहुंचाना आसान है। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्लाउड कंप्यूटिंग और रिमोट वर्क ने कई सेवाओं को व्यापार योग्य बना दिया है। जैसे-जैसे दूरी का महत्त्व कम होता जा रहा है और डिजिटल व्यापार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे भारत से सेवाओं का निर्यात बढ़ रहा है।

निश्चित रूप से भारत की आर्थिक ताकत को और तेजी से बढ़ाने के लिए हमें बहुआयामी दृष्टिकोण के साथ कई बातों पर ध्यान देना होगा। अब अल्पकालिक वृद्धि के पीछे भागने के बजाय, भारत को मध्यम अवधि की राजकोषीय और बाह्य स्थिरता को सुरक्षित रखना होगा। लंबे समय से लंबित सुधारों को आगे बढ़ाना होगा। अब भारत का ध्यान सेवाओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने पर होना चाहिए। एआई जैसे उच्च स्तरीय क्षेत्रों में निवेश, मजबूत डिजिटल अधोसंरचना, और नियामक बाधाओं को बहुपक्षीय प्रयासों के माध्यम से आसान बनाना होगा, जो सीमाओं के पार सेवा निर्यात को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकें। इस बात की ओर भी ध्यान देना होगा कि भारत का जो निर्यात कुछ ही बाजारों और कुछ ही देशों तक सीमित है, उसे विभिन्न अधिक वस्तुओं और विभिन्न अधिक देशों तक विस्तारित किया जाए। इन सबके साथ-साथ बुनियादी ढांचा, निवेश अनुकूल वातावरण, श्रम सुधार, नवीनीकरण ऊर्जा आदि को ध्यान में रखकर भारत दुनिया का और अधिक आर्थिक भरोसा बढ़ा सकेगा। साथ ही भारत 2047 तक विकसित भारत बनने की राह पर भी आगे बढ़ते हुए दिखाई दे सकेगा।

डा. जयंती लाल भंडारी

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