हममें से ज्यादातर लोग बचपन से लेकर आज तक ट्रेन में सफर करते आए हैं. कभी स्कूल की छुट्टियों में नानी के घर जाना हो या नौकरी के लिए दूसरे शहर, ट्रेन हर सफर का हिस्सा रही है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हजारों यात्रियों को मंजिल तक पहुंचाने वाली ये ट्रेनें आखिर अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर कहां जाती हैं? क्या उन्हें सीधे कबाड़ में बेच दिया जाता है या फिर उनका इस्तेमाल किसी और काम में होता है? दरअसल, भारतीय रेलवे में ट्रेनों का सफर रिटायर होने के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं होता. कई ट्रेनें नए रूप में फिर से रेलवे की सेवा में लौट आती हैं. यही वजह है कि उनका आखिरी सफर भी काफी दिलचस्प होता है.

भारतीय रेलवे में हर कोच और इंजन की एक निश्चित लाइफ होती है. पुराने इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF), लगभग 25 से 30 साल तक चलाए जाते हैं, जबकि आधुनिक और ज्यादा सुरक्षित माने जाने वाले लिंक होफमैन बुश (LHB) कोच करीब 35 साल तक सेवा देते हैं. हालांकि सिर्फ उम्र के आधार पर ही ट्रेन को रिटायर नहीं किया जाता. अगर किसी कोच की मरम्मत पर ज्यादा खर्च आने लगे, उसकी तकनीक पुरानी पड़ जाए या सुरक्षा से जुड़ी दिक्कतें सामने आने लगें, तो रेलवे उसे तय समय से पहले भी सेवा से बाहर कर सकता है. यात्रियों की सुरक्षा और बेहतर सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए रेलवे समय-समय पर पुराने डिब्बों को हटाता रहता है.

रिटायर होने के बाद बदल जाता है ट्रेन का काम
दिलचस्प बात यह है कि रेलवे पुरानी ट्रेनों को तुरंत बेकार नहीं मानता. कई पुराने यात्री कोचों को नया रूप देकर मालगाड़ी के डिब्बों में बदल दिया जाता है. इन्हें NMG यानी New Modified Goods कोच कहा जाता है. इन डिब्बों से सीटें, पंखे, लाइट और बाकी यात्री सुविधाएं निकाल दी जाती हैं. इसके बाद अंदर का ढांचा मजबूत बनाया जाता है ताकि इनमें कार, ट्रैक्टर और छोटे कमर्शियल वाहन आसानी से ले जाए जा सकें. यानी जो ट्रेन कभी यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती थी, वही बाद में सामान ढोने का काम करने लगती है. जब कोई ट्रेन पूरी तरह इस्तेमाल ना करने लायक हो जाती है, तब उसे स्क्रैप यार्ड भेजा जाता है. वहां ट्रेन के कोच और इंजन को काटकर अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाता है. इनसे निकलने वाला लोहा, स्टील, कॉपर, एल्युमिनियम और दूसरे कीमती मटेरियल दोबारा इस्तेमाल किए जाते हैं. इतना ही नहीं, बैटरी, एसी यूनिट, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और कई अन्य पार्ट्स भी रीसायकल कर लिए जाते हैं. इससे रेलवे का खर्च कम होता है और पर्यावरण को भी फायदा मिलता है.

कुछ ट्रेनें बन जाती हैं इतिहास की पहचान
हर ट्रेन का अंत स्क्रैप यार्ड में नहीं होता. कुछ ऐतिहासिक और खास ट्रेनों को रेलवे संग्रहालयों(Railway Museum) में सुरक्षित रखा जाता है. पुराने इंजन और कोच कई बार हेरिटेज टूरिज्म का हिस्सा भी बन जाते हैं, जहां लोग पुराने जमाने की रेलवे तकनीक और इतिहास को करीब से देख पाते हैं. यही वजह है कि कुछ ट्रेनें रिटायर होने के बाद भी लोगों की यादों में हमेशा जिंदा रहती हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले 5 सालों में भारतीय रेलवे ने 1,000 से ज्यादा लोकोमोटिव और करीब 37 हजार कोच और मालगाड़ी डिब्बों को सेवा से हटाया है. इनमें से कुछ को नए कामों के लिए इस्तेमाल किया गया, कुछ को संग्रहालयों में जगह मिली और बाकी को रीसायकल(Recycle) कर दिया गया. यानि भारतीय रेलवे में ट्रेनों की कहानी पटरियों पर रुकती नहीं है. कोई मालगाड़ी बन जाती है, कोई इतिहास का हिस्सा और कोई नए रूप में फिर रेलवे की सेवा में लौट आती है. यही वजह है कि ट्रेनों का सफर रिटायरमेंट के बाद भी जारी रहता है.

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