आज जो भी सोने में निवेश करना चाहे, वो ईटीएफ में पैसा लगा सकता है, और सोने में मूल्य वृद्धि का लाभ ले सकता है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) ने 4 मई 2026 को एक नए ट्रेडिंग सेगमेंट के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रसीद (ईजीआर) की शुरुआत की है…
पिछले लगभग 3 माह से अमरीका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के बाद कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधा आने और कीमतों में लगातार वृद्धि होने से देश का आयात-निर्यात का असंतुलन पहले से भी ज्यादा विकट हो गया है। ऐसे में भारतीय रुपया तेजी से कमजोर होकर 95 से 97 रुपए प्रति डालर के आसपास चल रहा है और कई विशेषज्ञ तो यह आशंका भी व्यक्त कर रहे हैं कि यह 100 रुपए प्रति डालर की सीमा भी लांघ सकता है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता से यह भावुक अपील की है कि वे न केवल पेट्रोलियम पदार्थों के उपभोग को कम करें, बल्कि विदेशी मुद्रा बचाने हेतु सोने की खरीद को भी कम करे और जरूरत से ज्यादा विदेश यात्राएं भी न करें। हालांकि सोने के आयात पर समय-समय पर आयात शुल्क बढ़ाने से लेकर मात्रात्मक नियंत्रण लगाने तक, कई अंकुश लगाए जाते रहे हैं, लेकिन शायद यह पहली बार है कि देश के किसी प्रधानमंत्री ने लोगों से सोने की खरीद घटाने के लिए अपील की है। भारत में लोगों का सोने की खरीद के प्रति आकर्षण कोई नई बात नहीं है। हजारों वर्षों से देश के लोग आभूषणों के रूप में सोने की भारी खरीद करते रहे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री की अपील से कुछ लोगों को ऐसा लगा कि शायद प्रधानमंत्री आभूषणों की खरीद पर अंकुश लगाने की अपील कर रहे हैं। क्या आज सोने की सारी मांग आभूषणों के लिए है?
इस संदर्भ में हमें समझना होगा कि पिछले लगभग दो दशकों से देश में आभूषणों के रूप में सोने की खरीद में भारी कमी आई है, लेकिन फिर भी देश में सोने का आयात लगातार बढ़ता जा रहा है। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए हमें वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों को देखना और समझना पड़ेगा। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 की पहली तिमाही में भारत में कुल सोने का आयात 150 टन रहा, लेकिन आभूषणों के लिए सोने की मांग सिर्फ 66 टन ही थी। पूर्व में विश्व स्तर पर आभूषण के लिए सोने की मांग 50 प्रतिशत से ज्यादा होती थी, लेकिन यह लगातार घटते हुए वर्ष 2025 तक मात्र 31 प्रतिशत ही रह गई। वर्ष 2025 में पहली बार निवेश के लिए सोने की मांग 2175 टन तक पहुंच गई जो आभूषणों हेतु सोने की मांग से भी ज्यादा थी। यानी कहा जा सकता है कि देश और विश्व में सोने की मांग इसलिए नहीं बढ़ रही कि स्वर्ण आभूषणों की मांग बढ़ रही है, बल्कि क्योंकि लोग अब सोने को निवेश के रूप में भी रखना चाहते हैं। यही नहीं भारतीय रिजर्व बैंक सहित अधिकांश बड़े देशों के केंद्रीय बैंक भी अपने विदेशी मुद्रा भंडारों में सोने का अनुपात बढ़ाते जा रहे हैं। गौरतलब है कि सितंबर 2025 से लेकर अब तक भारतीय रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा 13.92 प्रतिशत से बढक़र 16.85 प्रतिशत हो चुका है। यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है कि हाल ही में कुछ ऐसे समाचार भी आए कि रिजर्व बैंक ने अपना काफी सोना बेच दिया है, लेकिन 3 जून को जारी स्पष्टीकरण के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक के पास सोने के भंडार 880.52 टन पर बरकरार है। पिछले लंबे समय से देश में सोना बड़ी मात्रा में आयात होता रहा है। लेकिन इस संदर्भ में खास बात यह है कि जीडीपी में वृद्धि के साथ-साथ सोने का आयात भी बढ़ता रहा है। 1991 के बाद सोने के आयात की प्रवृत्ति पहले से ज्यादा बढ़ी है।
इसका कारण यह भी रहा कि 1991 से पूर्व सोने के आयात पर भारी नियंत्रण था और न केवल ऊंचे आयात शुल्क लगाए जाते थे, बल्कि सोने के आयात के लिए लाईसेंस की अनिवार्यता भी थी। इसके चलते बड़ी मात्रा में सोने की तस्करी भी होती थी। हालांकि आधिकारिक तौर पर सोने के आयात कम होते थे, लेकिन देश में सोने का उपभोग लगातार ज्यादा बना रहा। 1981 से 1985 के बीच बहुत कम सोने का आयात हुआ, लेकिन 1986 से 1988 के बीच नियमों में ढील दिए जाने के कारण सोने के आधिकारिक आयात में थोड़ी-बहुत वृद्धि हुई, लेकिन उसके बावजूद 10 से 20 टन ही प्रतिवर्ष सोना आयात होता था। इस ढील का लाभ उठाते हुए 1989 से 1991 के बीच सोने का आधिकारिक आयात 10 से 30 टन वार्षिक हो गया, जबकि सोने की कुल आवक (तस्करी समेत) 200 से 300 टन प्रति वर्ष आंकी गई। 1992 में सरकार ने अनिवासी भारतीयों के लिए आयात स्कीम लागू की और 1993 में बैंकों और नामित एजेंसियों के माध्यम से सोने का आधिकारिक आयात होना शुरू हो गया। इसके चलते तस्करी में भारी गिरावट आई और अब आधिकारिक आयात काफी बड़ी मात्रा में बढ़ गया। 1993 से 1994 के बीच 200 टन सोने का आयात हुआ और 1995 से 1997 के बीच यह 400 से 500 टन तक पहुंच गया। और उसके बाद सोने का आयात सामान्यत: 600 से 900 टन वार्षिक तक रहा, जबकि कई वर्षों में तो यह 1000 टन तक पहुंच गया। बढ़ते आयातों के मद्देनजर 2012-13 तक आते-आते सोने पर आयात नियंत्रण वापस आए और न केवल आयात शुल्क बढ़ाया गया, बल्कि बैंकों पर सोने के आयात को लेकर कई नियंत्रण लगा दिए गए। आयातकों पर यह शर्त लगाई गई कि अपने कुल सोने के आयात का उन्हें कम से कम 20 प्रतिशत पुनर्निर्यात करना होगा। कोरोना महामारी के दौरान थोड़े समय के लिए सोने का आयात थमा, लेकिन उसके उपरांत उसमें और ज्यादा तेजी आ गई। 2021 के बाद सोने का आयात तो बढ़ ही रहा था, लेकिन 2024 में आयात शुल्क घटाए जाने के बाद 2025-26 तक यह 72 अरब डालर तक पहुंच गया। हालांकि मात्रा की दृष्टि से 2025-26 में 2024-25 की तुलना में कम सोने का आयात हुआ, लेकिन सोने की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि के चलते डालरों में सोने का आयात पिछले साल की तुलना में ज्यादा हो गया।
लीक से हटकर विचार करने की जरूरत
समझा जा सकता है कि सोने के बढ़ते आयातों के चलते आज भारत के विदेशी मुद्रा भंडारों पर दबाव पडऩा शुरू हो गया है। परंपरागत स्वर्ण आभूषणों के लिए होने के बजाय अब जहां सोने के आयात ज्यादातर निवेश के लिए होने लगे हैं, इसलिए इस बाबत विचार करना जरूरी है कि लोग निवेश के लिए कुछ अलग प्रकार के उपकरणों का उपभोग करें। पूर्व में भौतिक रूप से ही सोना खरीदे जाने की संभावना होती थी, लेकिन अब उसके काफी विकल्प शुरू हो चुके हैं। ईटीएफ उसमें से एक है। गौरतलब है कि देश में विभिन्न प्रकार के ईटीएफ का कुल पूंजीगत मूल्य 1.9 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। आज जो भी सोने में निवेश करना चाहे, वो ईटीएफ में पैसा लगा सकता है, और सोने में मूल्य वृद्धि का लाभ ले सकता है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) ने 4 मई 2026 को एक नए ट्रेडिंग सेगमेंट के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रसीद (ईजीआर) की शुरुआत की है। यह भारत के विशाल और परंपरा-आधारित सोने के बाजार को आधुनिक बनाने और औपचारिक रूप देने की दिशा में एक अहम कदम है।
जहां ईटीएफ को स्टॉक मार्केट में केवल रुपए में बेचा या खरीदा जा सकता है, वहीं इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड को कभी भी भौतिक सोने के रूप में बदला जा सकता है। स्टॉक मार्केट में इस प्रकार के उत्पाद आने के कारण अब भौतिक सोने की खरीदी कर निवेश करने के दूसरे विकल्प सामने आ रहे हैं, जिससे सोने के आयात की प्रवृत्ति थोड़ी कम हो सकती है। हालांकि भौतिक सोने की खरीद के कुछ नए विकल्प बाजार में उपलब्ध हो रहे हैं, लेकिन अभी यह व्यवस्था शैशव काल में ही है। लीक से हटकर कुछ नए प्रकार की व्यवस्था के निर्माण की जरूरत है, ताकि लोग भौतिक सोने की खरीद से बचें और उन विकल्पों में निवेश करें, ताकि सोने के मूल्य में वृद्धि का लाभ भी उठाया जा सके और देश में सोने के आयात पर अंकुश भी लग सके।
डा. अश्वनी महाजन



















