केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से हाल में जारी एक रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि मई 2026 में थोक महंगाई दर में भारी उछाल दर्ज किया गया और यह 9.68 प्रतिशत पर पहुंच गई है। अगर हम इसकी तुलना अप्रैल 2026 से करें, तो तब यह दर लगभग 8.3 प्रतिशत के करीब थी। केवल एक महीने के भीतर महंगाई का इतनी तेजी से ऊपर जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की अर्थव्यवस्था में सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है। यह आंकड़ा देश के हर एक नागरिक, हर छोटे-बड़े व्यापारी और हर उद्योग पर पड़ने वाले सीधे असर की ओर इशारा करता है। महंगाई ने न केवल देश के शीर्ष नीति-निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, बल्कि आम जनता के घर के बजट को भी पूरी तरह बिगाड़ दिया है।

दरअसल, थोक महंगाई मुख्य रूप से वह दर है, जिस पर थोक बाजार में चीजों की बड़े पैमाने पर खरीद-बिक्री होती है। यानी जब कोई बड़ा कारखाना या उत्पादक अपना तैयार माल थोक विक्रेताओं या वितरकों को बेचता है, तो वस्तुओं की कीमतों में जो बदलाव आता है, उसे इसी दर से मापा जाता है। हालांकि, आम आदमी सीधे तौर पर थोक बाजार से सामान नहीं खरीदता है, लेकिन अर्थशास्त्र का यह नियम है कि जब थोक में सामान महंगा होता है, तो कुछ ही समय बाद खुदरा बाजार में भी उसी अनुपात में दाम बढ़ जाते हैं। थोक महंगाई आज की कड़वी सच्चाई है, जिसकी आंच कल आम आदमी की रसोई और जेब तक तेजी से पहुंचने वाली है।

केंद्र सरकार ने हाल ही में महंगाई को मापने के इस पारंपरिक तरीके में एक बड़ा बदलाव किया है। लगभग 14 वर्षों बाद थोक महंगाई सूचकांक के आधार वर्ष को पूरी तरह बदल दिया गया है। पहले यह आधार वर्ष 2011-12 हुआ करता था, लेकिन अब इसे अद्यतन कर वर्ष 2022-23 कर दिया गया है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य आज की बदलती अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर को सामने लाना है।

इतना ही नहीं, पहले के सूचकांक में सिर्फ 697 वस्तुओं की कीमतों पर नजर रखी जाती थी, लेकिन अब नई प्रणाली में 957 अलग-अलग वस्तुओं को शामिल कर लिया गया है। इस नए सूचकांक में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु बिजली को पहली बार शामिल किया गया है। इसके साथ ही, कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस को प्राथमिक वस्तुओं की श्रेणी से हटाकर ‘ईंधन और ऊर्जा’ के समूह में डाल दिया गया है। सरकार ने इस मूल्य निर्धारण प्रणाली को दुनिया के विकसित देशों के मानकों के अनुरूप बनाने के लिए और अधिक पारदर्शी तरीके से ‘प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स’ (पीपीआई) की शुरुआत भी की है।

सवाल है कि थोक महंगाई ने अचानक इतनी तेज छलांग क्यों लगाई? दरअसल, थोक महंगाई की इस आग में सबसे ज्यादा घी डालने का काम ईंधन की कीमतों ने किया है। नई रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि मई 2026 में ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र की महंगाई दर 30.33 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई, जो अप्रैल में 24.89 प्रतिशत थी। इसका प्रमुख कारण पश्चिम एशिया में चल रहा भू-राजनीतिक तनाव और देशों के बीच का संघर्ष है। जब भी दुनिया के उस संवेदनशील हिस्से में अशांति होती है, जहां से पूरी दुनिया को कच्चा तेल मिलता है, तो ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेश से ही खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए भारी उछाल ने भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था की रफ्तार को धीमा कर दिया है।

दूसरी ओर, खाद्य महंगाई हमेशा से भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में संवेदनशील मुद्दा रही है, क्योंकि एक आम भारतीय परिवार की आय का बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ खाने-पीने की बुनियादी चीजों पर ही खर्च होता है। रिपोर्ट के अनुसार, मई 2026 में खाने-पीने की चीजों की थोक महंगाई दर भी तेजी से उछलकर 4.49 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो अप्रैल में 3.11 प्रतिशत के स्तर पर थी। अगर हम सिर्फ प्राथमिक खाद्य वस्तुओं के सूचकांक को देखें, तो यह दर 3.60 प्रतिशत तक जा पहुंची है। यानी अनाज, फल और दूध जैसी बुनियादी चीजों के दाम भी थोक मंडियों में तेजी से बढ़ रहे हैं। विशेष रूप से तिलहन और मसालों की कीमतों में भारी उछाल देश भर में चिंता का विषय बना हुआ है।

इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण जिम्मेदार हैं। पहला, माल ढुलाई का महंगा होना, क्योंकि किसानों के खेतों से निकलकर मंडियों और फिर दुकानों तक अनाज पहुंचाने में डीजल का भारी मात्रा में इस्तेमाल होता है। दूसरा बड़ा कारण मौसम की अनिश्चितता और जलवायु परिवर्तन है। पिछले कुछ समय में कम बारिश, बेमौसम बरसात और बढ़ते तापमान ने कृषि उत्पादन पर काफी बुरा असर डाला है।

इस महंगाई का एक और बेहद गंभीर पहलू हमारे देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) से सीधे तौर पर जुड़ा है। ये छोटे उद्योग हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं और सबसे अधिक रोजगार इन्हीं क्षेत्रों से पैदा होता है। जब बड़े कारखानों में महंगाई बढ़ती है, तो उनके पास अक्सर इतना पैसा और बाजार की शक्ति होती है कि वे उस झटके को सह सकें या उसे आसानी से ग्राहकों तक पहुंचा सकें, लेकिन छोटे उद्योगों के पास यह सुविधा नहीं होती।

जब किसी छोटे कारखाने को कच्चे माल के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है और साथ ही उसे परिवहन और बिजली का भी भारी बिल चुकाना पड़ता है, तो उसका थोड़ा-बहुत मुनाफा भी खत्म हो जाता है। अगर वह अपनी चीजों की कीमत बहुत बढ़ा देता है, तो आम ग्राहक उसे खरीदना बंद कर देते हैं और बड़ी कंपनियों के उत्पाद खरीदने लगते हैं। इस दोहरी मार से कई छोटे कारखाने बंद होने के कगार पर पहुंच जाते हैं। जब ये बंद होते हैं, तो वहां काम करने वाले श्रमिकों का रोजगार भी छिन जाता है।

किसी व्यक्ति का रोजगार जाने का मतलब है कि उस पूरे परिवार की सामान खरीदने की क्षमता खत्म हो जाना। जब लोग बाजार से सामान खरीदना कम कर देते हैं, तो मांग तेजी से घट जाती है और जब मांग घटती है, तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार स्वाभाविक रूप से धीमी पड़ने लगती है।

थोक महंगाई की यह नई रिपोर्ट केवल बढ़ती कीमतों का एक साधारण संकेत नहीं है, बल्कि यह हमारे उद्योग जगत के सामने खड़े एक बड़े आर्थिक संकट की चेतावनी भी है। जब तक ऊर्जा की अपनी जरूरतों के लिए भारत की निर्भरता दूसरे देशों के कच्चे तेल पर ज्यादा बनी रहेगी, तब तक देश की अर्थव्यवस्था इसी तरह विदेशी झटकों का शिकार होती रहेगी। इस समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान यही है कि भारत को सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन जैसे वैकल्पिक एवं स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की तरफ अपने कदम मजबूती से बढ़ाने होंगे, ताकि वह ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके।

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