पंजाब के कई राजनेताओं, विशेष रूप से मनप्रीत सिंह अयाली के पुनर सुरजीत अकाली दल छोड़कर अकाली दल ‘वारिस पंजाब दे’ में शामिल होने और कई अन्य पाॢटयों के नेताओं द्वारा ‘वारिस पंजाब दे’ में शामिल होने के कारण पंथक राजनीति एक बार फिर नए दौर में प्रवेश कर रही है। लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल (बादल) को पंथक राजनीति का मुख्य केंद्र माना जाता रहा लेकिन अब अकाली दल ‘वारिस पंजाब दे’ और अकाली दल ‘पुनर सुरजीत’ जैसी ताकतों के सक्रिय होने से राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह नया राजनीतिक माहौल शिरोमणि अकाली दल (बादल) के लिए चुनौती बन सकता है? कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह चुनौती मुख्य रूप से अकाली वोट बैंक के बंटवारे के रूप में सामने आ सकती है।
शिरोमणि अकाली दल (बादल) का ग्रामीण पंजाब और सिख मतदाताओं में कई दशकों से आधार रहा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी को कई राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इस दौरान अकाली दल ‘वारिस पंजाब दे’ ने खुद को पंथक मुद्दों की नई आवाज के रूप में पेश करने की कोशिश की है। लोकसभा की 2 सीटें जीतकर इस कोशिश को कामयाबी की ओर बढ़ाया भी है। अकाली दल (अमृतसर) भी लंबे समय से अपने अलग पंथक एजैंडे के साथ सक्रिय है, जबकि अकाली दल ‘पुनर सुरजीत’ प्रभावशाली शुरुआत करने के बावजूद अकाली दल ‘वारिस पंजाब दे’ के मुकाबले कुछ कमजोर होता दिखाई दे रहा था। लेकिन अब अकाली दल पुनर सुरजीत के कई नेताओं द्वारा साहनेवाल के गुरुद्वारा रेरू साहिब में पंथक धड़ों को इकट्ठा करने के लिए एक बैठक की गई। इस बैठक में पुनर सुरजीत के कई बड़े नेता शामिल हुए और उनके द्वारा वारिस पंजाब दे, अकाली दल अमृतसर और अन्य पंथक धड़ों के साथ एकता करने के लिए एक कमेटी का गठन किया गया।
इस कमेटी के प्रमुख सदस्य जत्थेदार संता सिंह और इकबाल सिंह झूंदां ने अकाली दल वारिस पंजाब दे के बापू तरसेम सिंह और मनप्रीत सिंह अयाली सहित कई नेताओं के साथ बातचीत की है, हालांकि एक बार पहले भी गठबंधन की कोशिश की गई थी लेकिन वह सफल नहीं हुई थी, पर अब इनके द्वारा एक सांझे एजैंडे पर सहमति बना ली गई है। इस तरह अकाली दल वारिस पंजाब दे और अकाली दल पुनर सुरजीत द्वारा आगामी विधानसभा चुनाव मिलकर लडऩे का रास्ता साफ हो रहा है। और इस कमेटी द्वारा जल्द ही अकाली दल अमृतसर और अन्य पंथक पक्षों के साथ एकता के बारे में बातचीत करने की संभावना है। इस समय अकाली दल बादल के मुकाबले पर अकाली दल वारिस पंजाब दे, अकाली दल पुनर सुरजीत और अकाली दल अमृतसर प्रमुख विपक्षी धड़ों के रूप में गिने जा सकते हैं।
अब सोचने वाली बात है कि इस समय इन धड़ों का जन आधार क्या है। अकाली दल ‘वारिस पंजाब दे’ के प्रभाव की बात करें तो उसने खास तौर पर युवा मतदाताओं और पंथक सोच वाले वर्ग में अपनी पहचान बनाने की कोशिश की है। यदि यह समर्थन और बढ़ता है, तो वह पारंपरिक अकाली वोट बैंक के एक हिस्से को प्रभावित कर सकता है। हालांकि यह प्रभाव पूरे पंजाब में एक जैसा होगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। अकाली दल (अमृतसर) लंबे समय से पंथक राजनीति का हिस्सा है। भले ही इसे बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिली लेकिन कुछ क्षेत्रों में इसका एक स्थायी समर्थक वर्ग है। यह भी कई हलकों में पंथक वोटों के समीकरण को प्रभावित कर सकता है। अकाली दल ‘पुनर सुरजीत’ ने राज्य स्तर पर बड़ी ताकत के रूप में शुरुआत की, परंतु नेतृत्व में एकजुटता की कमी के कारण यह धड़ा पहले से कुछ कमजोर हो रहा है, फिर भी जहां इसके बड़े और जन आधार वाले नेता चुनाव लड़ेंगे, वहां यह पार्टी चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकती है।
आखिरी सवाल है कि क्या ये अकाली धड़े अकाली दल (बादल) के लिए बड़ी चुनौती हो सकते हैं? यह कहना कि अकाली दल ‘वारिस पंजाब दे’ या अन्य धड़ों ने पहले ही शिरोमणि अकाली दल (बादल) का स्थान ले लिया है, तथ्यों के आधार पर ठीक नहीं होगा। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि पंथक राजनीति में मुकाबला पहले से काफी बढ़ गया है। शिरोमणि अकाली दल (बादल) के पास अभी भी संगठन, अनुभव और कई क्षेत्रों में पारंपरिक आधार मौजूद है, जबकि नई ताकतें अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। 2027 के चुनावों में यह महत्वपूर्ण होगा कि क्या पंथक वोट एकजुट रहते हैं या कई धड़ों में बंट जाते हैं। इसका प्रभाव न केवल शिरोमणि अकाली दल (बादल) पर, बल्कि पंजाब की समग्र राजनीतिक तस्वीर पर भी पड़ सकता है। परंतु नए बन रहे समीकरणों के कारण यदि बादल विरोधी सभी धड़े इक हो जाते है, तो अकाली दल बादल के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं।-इकबाल सिंह चन्नी



















