भारत में आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह राजनीति और चुनाव का ‘अमोघ अस्त्र’ बन चुका है। संविधान में भी अनुच्छेद 340, 341 में उल्लेख है कि सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक विषमताओं, विसंगतियों को खत्म करने और कुछ समुदायों को समानता की मुख्यधारा में लाने को आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई है। यह व्यवस्था आजादी और संविधान लागू होने के बाद सिर्फ 10 सालों के लिए थी, लेकिन 79 साल की आजादी के बाद भी जारी है और उसे निरंतर जारी रखना सरकारों की विवशता भी है। आरक्षण संवैधानिक अधिकार नहीं है, मौलिक अधिकार भी नहीं है, सिर्फ एक व्यवस्था है, जिसे बढ़ाया जाता रहा है। अनुच्छेद 15 और 16 में आरक्षण की शक्ति राज्य को दी गई है, लेकिन सर्वोच्च अदालत यह भी स्पष्ट कर चुकी है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक व्यवस्था है। संविधान में आर्थिक रूप से गरीब, कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की गई, इसका जवाब हम नहीं दे सकते। क्या ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, भूमिहार आदि सवर्ण वर्ग ‘गरीब’ नहीं हैं? हमारे पुरखों ने यह कल्पना क्यों नहीं की? क्या उस समय देश में कोई भी सवर्ण ‘कमजोर’ नहीं था? ये सवाल निरंतर अनुत्तरित रहेंगे। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए 10 फीसदी का आरक्षण संसद से पारित कराया था, जिसे सर्वोच्च अदालत ने भी ‘न्यायिक’ माना, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। दरअसल छिद्र और विसंगतियां आरक्षण की व्यवस्था में हैं। उस संदर्भ में सर्वोच्च अदालत ने ‘क्रीमी लेयर’ का फैसला सुनाया था। ‘क्रीमी लेयर’ की आय-सीमा 8 लाख रुपए सालाना तय है। उससे अधिक आय वाले आरक्षित वर्गों के बच्चों को आरक्षण नहीं मिलेगा। लेकिन यह न्यायिक व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं है। हम ऐसे कई परिवारों को जानते हैं, जिनमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आईएएस, आईपीएस अधिकारी हैं। उनके परिवारों को आरक्षण क्यों चाहिए? या क्यों दिया जाना चाहिए? लोकसभा में 131 सांसद ‘आरक्षित’ हैं। अनुसूचित जाति के 84 और जनजाति के 47 सांसद हैं।
राज्यों की विधानसभाओं में भी सैकड़ों आरक्षित विधायक हैं। मंत्री, राज्यमंत्री और अन्य पदों पर भी आरक्षित चेहरे हैं। यदि राष्ट्रीय स्तर के चेहरों का उल्लेख करें, तो बसपा प्रमुख एवं उप्र की चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती, लोकसभा सांसद एवं उप्र के ही पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और रामदास अठावले आदि के परिवारों और बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? पासवान परिवार में रामविलास पासवान (अब दिवंगत) के समय से भाई, भतीजा, दामाद सभी सत्ता में रहे अथवा सांसद-विधायक रहे। आखिर सामाजिक पिछड़ेपन, विषमताओं से उबरने का मापदंड क्या है? यह सरकारों ने तय नहीं किया और सर्वोच्च अदालत ने भी कोई फैसला नहीं सुनाया। राजनीति और सरकारें तो आरक्षण के सामने नतमस्तक हैं, बंधक बनी हैं। ‘क्रीमी लेयर’ की परवाह कौन करता है? आप शिक्षित हैं, आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं, सामाजिक रुतबा भी है, विषमताओं से बाहर आने का और क्या आधार होना चाहिए? हम यह विश्लेषण इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि सवर्ण युवाओं ने ‘जंतर-मंतर’ पर प्रदर्शन किया था। उन्होंने यह मुद्दा उठाते हुए आरक्षण की समीक्षा करने, उसमें सुधार करने की मांग की है। वे खुद को ‘संवैधानिक अछूत’ मान रहे हैं। यह नौबत क्यों आई? वे भी ‘जेन-जी’ के चेहरे हैं। वे प्रतिभाशाली हैं, अच्छे अंकों से परीक्षाएं पास कर रहे हैं, लेकिन उनकी सामान्य श्रेणी की इतनी रिक्तियां नहीं हैं कि उन्हें नौकरी मिल सके। आरक्षण का मुद्दा उठा है, तो केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान जैसे नेतागण इस मुद्दे पर विमर्श को ही तैयार नहीं हैं। आरक्षण को संवैधानिक अधिकार करार दे रहे हैं। विपक्ष ने एक बार फिर नेरेटिव गढऩा शुरू कर दिया है कि भाजपा-संघ आरक्षण के साथ-साथ संविधान को भी खत्म करना चाहते हैं। यही नेरेटिव 2024 के लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल किया गया था। गृहमंत्री अमित शाह संसद में वक्तव्य दे चुके हैं कि यदि बाबा अंबेडकर भी आज आ जाएं, तो भी आरक्षण खत्म नहीं होगा। समीक्षा में क्या दिक्कत है? सवर्ण भी देश के नागरिक हैं।



















