एएनआई के अनुसार, विजय सिंह ने 25 सितंबर को महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर और ग्रेटर मुंबई क्षेत्र के डिप्टी/असिस्टेंट चैरिटी कमिश्नर को ईमेल भेजा. इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि टाटा संस के कारोबारी और रणनीतिक मामलों में ट्रस्ट की बढ़ती भागीदारी से उसकी धर्मार्थ संस्था के तौर पर स्थिति प्रभावित हो सकती है. इससे ट्रस्ट की आयकर छूट और उसकी संपत्तियों पर भी कर देनदारी का जोखिम पैदा हो सकता है.
एक अन्य ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन ने भी चैरिटी कमिश्नर को इसी तरह का पत्र लिखा है. उन्होंने भी ट्रस्ट की गवर्नेंस और टाटा संस के मामलों में उसकी भूमिका को लेकर चिंता जताई है.
टाटा संस के कारोबारी मामलों में दखल का आरोप
विजय सिंह ने अपने ईमेल में टाटा संस के वाणिज्यिक और रणनीतिक मामलों में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और टाटा ट्रस्ट्स की बढ़ती भूमिका को गंभीर चिंता का विषय बताया. उनका कहना है कि सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट होने के नाते SDTT को केवल टाटा संस में बड़ी हिस्सेदारी होने के आधार पर कंपनी के कारोबारी संचालन में सीधे शामिल नहीं होना चाहिए.
विजय सिंह ने 17 सितंबर को जारी टाटा ट्रस्ट्स की दो प्रेस रिलीज का भी जिक्र किया. इनमें टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप की हिस्सेदारी को लेकर प्रस्ताव शामिल थे.
विजय सिंह के मुताबिक, पहली प्रेस रिलीज में बताया गया था कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने जुलाई 2025 में टाटा संस को अनलिस्टेड रखने का फैसला किया था और कंपनी को इसकी जानकारी दी थी.
दूसरी प्रेस रिलीज में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन. टाटा की ओर से टाटा संस के बोर्ड के सामने SP ग्रुप की हिस्सेदारी को लेकर प्रस्ताव रखने की बात कही गई थी. प्रस्ताव में दो चरणों में हिस्सेदारी खरीदने, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के जरिए चुनिंदा पूंजी कटौती और अलग-अलग वित्तीय स्रोतों के इस्तेमाल की बात थी.
ट्रस्ट के निदेशक की स्वतंत्रता पर भी सवाल
विजय सिंह ने आरोप लगाया कि इन कदमों से संकेत मिलता है कि ट्रस्ट के चेयरमैन और उसकी ऑपरेटिंग टीम टाटा संस से जुड़े बड़े कारोबारी सौदों की पहचान, बातचीत और उन्हें लागू कराने की प्रक्रिया में सीधे भूमिका निभा रहे हैं.
उन्होंने 16 सितंबर को SDTT की ओर से जारी एक सर्कुलर प्रस्ताव का भी जिक्र किया. सिंह के अनुसार, इसमें सर रतन टाटा ट्रस्ट और SDTT की ओर से संयुक्त रूप से नियुक्त नामित निदेशक वेणु श्रीनिवासन को टाटा संस की संभावित लिस्टिंग से जुड़े मामले में हिस्सा लेने या वोट करने से रोकने की कोशिश की गई.
सिंह ने आरोप लगाया कि इससे श्रीनिवासन के स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और फैसले लेने का अधिकार कुछ ट्रस्टियों तक सीमित हो सकता है.
ट्रस्टियों की नियुक्ति की जांच की मांग
सिंह ने चैरिटी कमिश्नर से कई मुद्दों की जांच कराने की मांग की है. इनमें मौजूदा परपेचुअल ट्रस्टी की नियुक्ति और उनके पद पर बने रहने का आधार, नोएल टाटा के टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन बनने का आधार और नेविल एन. टाटा की नियुक्ति शामिल है. उन्होंने श्रीनिवासन को संबंधित फैसलों से कथित तौर पर अलग रखने की भी जांच की मांग की है.
सिंह ने यह भी अनुरोध किया है कि कुछ ट्रस्ट संबंधी फैसलों में नोएल टाटा खुद को अलग रखें. साथ ही, टाटा संस के बोर्ड की कुछ चर्चाओं से भी उनके अलग रहने की मांग की गई है.
जांच पूरी होने तक सिंह ने SDTT के ट्रस्टी बोर्ड की मौजूदा संरचना में बदलाव नहीं करने और ट्रस्ट के प्रशासन, प्रबंधन या संरचना से जुड़े फैसलों को रोकने का अनुरोध किया है. उन्होंने जांच के निष्कर्षों के आधार पर ट्रस्टियों के निलंबन या हटाने जैसी कार्रवाई पर भी विचार करने की मांग की है.



















