नासिक: महाराष्ट्र के नासिक में जमीन से पीले रंग का तेल जैसा पानी निकल रहा है। बोतल में रखने पर यह तेल जैसा दिखाई देता है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) के विश्लेषण के अनुसार, नासिक के अंबड इलाके के भूजल में हेक्सावेलेंट क्रोमियम की अधिक मात्रा पाई गई है, जो एक जहरीला औद्योगिक प्रदूषक है। MPCB ने इस इलाके की 17 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का नोटिस भेजा है।
पीले पानी से साफ-सफाई, नहा-धो रहे थे लोग
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 20 सितंबर को नागरिकों की ओर से बोरवेल और हैंडपंपों में ‘पीला पानी’ मिलने की खबरें ऑनलाइन सामने आईं। इसके बाद, MPCB (महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम – MIDC क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध) के अधिकारी अंबड में एक बोरवेल से पानी के नमूने लेने पहुंचे। ‘साउथ एशियन नेटवर्क ऑफ डैम्स, रिवर्स एंड पीपल’ ( SANDRP ) भी इस इलाके में पहुंचा और उसने भी पानी के नमूने लिए, ताकि प्रयोगशाला में इसकी जांच की जा सके। लोग इस पानी का इस्तेमाल धोने, साफ-सफाई और नहाने के लिए कर रहे थे। अंबड नासिक का औद्योगिक उपनगरीय इलाका है।
1000 गुना ज्यादा खतरनाक क्रोमियम
- 11 अक्टूबर को जारी MPCB की लैब रिपोर्ट में पानी के अंदर 45 mg/l क्रोमियम, और साथ ही सल्फेट और क्लोराइड की काफी अधिक मात्रा पाई गई।
- वहीं, SANDRP के सैंपल नासिक की एक लैब में भेजे गए, जिसमें पानी के अंदर कुल 50.5 mg/l क्रोमियम मिला, जिसमें से 50.3 mg/l हेक्सावेलेंट क्रोमियम था।
- यह मात्रा ‘ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स’ द्वारा तय की गई 0.05 mg/l की सुरक्षित सीमा से 1,000 गुना से भी ज्यादा है।
2027 में लगने वाला है गोदावरी के किनारे कुंभ
2027 में नासिक में गोदावरी नदी के किनारे कुंभ मेले का आयोजन होने वाला है, जो प्रदूषण वाली जगह से 10 km से भी कम दूरी पर है। इससे इलाके के बोरवेल, हैंडपंप और जलधाराओं में औद्योगिक प्रदूषण को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं, जो वहां रहने वाले लोगों के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है।
हमें एक बोरवेल का परिणाम मिल चुका है, और तीन अन्य बोरवेल के नमूने आगे की जांच के लिए भेजे गए हैं। इस बीच, हमने उन प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है, जो बिना साफ किए गए दूषित पानी को नदियों और नालों में छोड़ रही हैं।
विद्यासागर किल्लेदार, नासिक में MPCB के क्षेत्रीय अधिकारी
एक पर्यावरण कार्यकर्ता ने सबसे पहले उठाया था ये मुद्दा
- द प्रिंट पर छपी एक खबर के अनुसार, पर्यावरण कार्यकर्ता रोशन केदार ने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाया था और MPCB से शिकायत की थी। उनका कहना है कि अंबड MIDC में इलेक्ट्रोप्लेटिंग से जुड़ी लगभग 80 इकाइयां हैं, वहां इस तरह का प्रदूषण होना एक आम बात है।
- केदार ने बताया, अंबड में भूजल प्रदूषण के सबसे पुराने रिकॉर्ड 2009 के हैं, और स्थानीय लोगों ने कई बार इसकी शिकायत की है। 2016 में भी कई उद्योगों को बंद किया गया था, लेकिन बाद में वे फिर से खुल गए। इसका कोई स्थायी समाधान निकाला जाना चाहिए।
अंबड में भूजल प्रदूषण के सबसे पुराने रिकॉर्ड 2009 के हैं, और स्थानीय लोगों ने कई बार इसकी शिकायत की है। 2016 में भी कई उद्योगों को बंद किया गया था, लेकिन बाद में वे फिर से खुल गए। इसका कोई स्थायी समाधान निकाला जाना चाहिए।
रोशन केदार, पर्यावरण कार्यकर्ता
हेक्सावेलेंट क्रोमियम खतरनाक क्यों है?
- इस मुद्दे पर SANDRP की 8 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, अंबाद के भूजल में हेक्सावेलेंट क्रोमियम का स्तर दुनिया के सबसे खराब प्रदूषण मामलों में से एक के बराबर है। यह 1996 के कुख्यात ‘एरिन ब्रोकोविच’ मामले में पाए गए स्तर से भी अधिक है।
- हेक्सावेलेंट क्रोमियम ‘ग्रुप 1’ का कैंसरकारी पदार्थ (carcinogen) है, जो कैंसर के खतरे को बढ़ाता है और साथ ही लिवर और किडनी को भी नुकसान पहुंचाता है। क्रोमियम की इतनी अधिक मात्रा के लगातार संपर्क में आने से लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ा है। कई लोगों के शरीर पर केमिकल अल्सर, रैशेज और छाले जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं।
जिंक प्लेटिंग और पाउडर कोटिंग की 80 फैक्ट्रियां
- नासिक MIDC में क्रोम-प्लेटिंग, जिंक-प्लेटिंग और पाउडर-कोटिंग करने वाली 80 फैक्ट्रियां हैं, जिनसे निकलने वाले कचरे में क्रोमियम होता है। SANDRP द्वारा तैयार किए गए एक नक्शे के अनुसार, यह कचरा अंबड के नालों में बहाया जाता है, जो आगे चलकर गोदावरी की सहायक नदी ‘नंदिनी’ में मिल जाते हैं।
- SANDRP की एसोसिएट कोऑर्डिनेटर परिणीता दांडेकर ने कहा, ‘यह जनस्वास्थ्य के लिए एक आपातकालीन स्थिति है। इसके लिए सिर्फ एक कंपनी नहीं, बल्कि कई उद्योग जिम्मेदार हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘यहां लगभग 20,000 लोग रहते हैं जो इस दूषित भूजल के संपर्क में हैं, और कुंभ मेले के दौरान यहाँ लाखों लोग और आएंगे।’
- हालांकि, SANDRP की रिपोर्ट में यह भी मांग की गई है कि नगर प्रशासन को यहां स्वास्थ्य शिविर लगाने चाहिए। सभी MIDC इकाइयों की फॉरेंसिक जांच करानी चाहिए। नंदिनी और गोदावरी नदियों के पानी का परीक्षण करके यह पता लगाना चाहिए कि वे कितनी दूषित हैं।



















