नई दिल्ली:फ्रांस जल रहा है. राजधानी पेरिस से लेकर तमाम बड़े शहरों में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. लोगों का कहना है कि फ्रांस में जो अभी हो रहा है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ. दुकानें लूटी जा रही हैं. गाड़ियां जलाई जा रही हैं. ऐतिहासिक इमारतों पर भी हमले हो रहे हैं. दावा है कि आठ लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतर आए हैं. हजारों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं.

ये सब अब से नहीं हो रहा है, बल्कि कई हफ्तों से जारी है. लेकिन शनिवार को फ्रांस बुरी तरह जला. कई जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं.
पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोइरे ने बताया कि शहर की कई सड़कें पूरी तरह तबाह हो गई हैं. नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने खड़ी कारों में आग लगा दी और कई दुकानों में तोड़फोड़ की.
वहीं, फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने शनिवार देर रात बताया कि अब तक हिंसा में शामिल 1,200 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इस हिंसा में 150 से ज्यादा पुलिस वाले घायल हुए हैं.
ये विरोध प्रदर्शन सितंबर में तब शुरू हुए थे, जब समर हॉलीडे के बाद अपने हाई स्कूलों के हालात से नाराज छात्रों ने प्रदर्शन करना शुरू किया. हालांकि, बाद में इनका दायरा और बढ़ गया, क्योंकि इसमें ऐसे और भी लोग शामिल हो गए जो बढ़ती महंगाई से बेहद नाराज थे.
कैसे हुई इन विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत?
सितंबर में ये सब शुरू हुआ. पेरिस के क्रेतेइल के एक हाई स्कूल में स्टाफ की कमी को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए.
वहां से, क्लासेस का बायकॉट, रास्ते ब्लॉक करना और विरोध प्रदर्शन दूसरे शहरों और फिर पूरे देश में, यहां तक कि छोटे शहरों तक फैल गए. तोड़-फोड़ या स्टाफ पर हमलों के कारण सैकड़ों स्कूलों को बंद करना पड़ा.
हाई स्कूल के छात्रों का कहना था कि उन्हें उन स्कूलों से शिकायतें हैं जहां संसाधनों की भारी कमी है, सुविधाएं जर्जर हालत में हैं और स्टाफ है ही नहीं.
फ्रांसीसी मीडिया ने जर्जर स्कूलों के वीडियो दिखाए, जिनमें चूहे दौड़ते हुए, छतें गिरी हुईं, पानी टपकता हुआ, फर्नीचर टूटा हुआ और कई तरह की बदहाल स्थितियां नजर आईं.
कुछ छात्रों ने यह भी शिकायत की कि गर्मियों में हीटवेव के दौरान, बिना एसी वाले क्लासरूम में वे भीषण गर्मी से तपते हैं, जबकि सर्दियों में वे ठंड से ठिठुरते हैं.
उनका कहना है कि स्कूल के दिन बहुत थका देने वाले होते हैं. साथ ही, यूनिवर्सिटी में एडमिशन की प्रक्रिया भी काफी जटिल है. कुछ यूनिवर्सिटी के छात्र भी इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए.
फ्रांस में इस बात को लेकर भी चिंताएं हैं कि वहां का एजुकेशन सिस्टम कई देशों के मुकाबले पिछड़ रहा है. साथ ही यह सिस्टम गरीब और वंचित लोगों की मदद करने में भी नाकाम हो रहा है.
शनिवार को कैसे हुई इतनी हिंसा?
सितंबर से चल रहे विरोध प्रदर्शन शनिवार को हिंसक हो गए. फ्रांस की सड़कों पर खूब झड़पें, आगजनी और लूटपाट हुई. ये लोग बढ़ती महंगाई के खिलाफ विरोध कर रहे थे.
शनिवार को इसलिए भी हिंसा हुई, क्योंकि फ्रांस के सबसे बड़े यूनियन में से एक जनरल कन्फेडरेशन ऑफ लेबर (CGT) ने इन विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया. प्रदर्शनकारियों ने कीमतें कम करने और सैलरी-पेंशन बढ़ाने की मांग की.
गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने कहा कि शनिवार को प्रदर्शन में 5.5 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए थे. इनमें से अकेले पेरिस में ही एक लाख से ज्यादा प्रदर्शनकारी थी. हालांकि, CGT ने 8 लाख से ज्यादा लोगों के शामिल होने का दावा किया है.
हजारों-लाखों लोग सड़कों पर उतरे. पेरिस, मार्सिले, नीस, नैनटेस, बोर्डो, लिमोज, लिले, टूलूज और स्ट्रासबर्ग जैसे शहरों में सुपरमार्केट, फार्मेसी, लग्जरी बुटीक, कपड़ों की दुकानें, चश्मे की दुकानें, कॉस्मेटिक की दुकानें और इलेक्ट्रॉनिक्स स्टोर सहित कई दुकानों में लूटपाट की गई.
पुलिस पर भी हमले बढ़ गए हैं. UNSA पुलिस यूनियन ने X पर एक वीडियो पोस्ट कर कहा कि कई जगहों पर भीड़ को डंडों और ईंटों से पुलिस वैन पर हमला करते हुए देखा जा सकता है.
ऐतिहासिक इमारतों में लगाई आग
प्रदर्शनकारियों ने कई ऐतिहासिक इमारतों पर भी हमला किया. लिमोज में टाउन हॉल को भी प्रदर्शनकारियों ने जला दिया.
यह इमारत 1876 में बनाई गई थी. विश्व युद्ध के दौरान भी इस इमारत को कुछ नहीं हुआ था, लेकिन फ्रांस के मौजूदा प्रदर्शनों में इसे जला दिया गया.
प्रदर्शनकारियों को काबू में करने के लिए टियर गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया. जबकि प्रदर्शनकारियों ने भी पत्थरबाजी की.
राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने X पर कहा कि ‘जिन लोगों ने तोड़फोड़ की है, प्रशासनिक कार्यालयों या व्यवसायों पर हमला किया है, या लूटपाट की है – यहां तक कि हमारे टाउन हॉल में भी – उन पर मुकदमा चलाया जाएगा और उन्हें सजा दी जाएगी.’



















