वैदिक आध्यात्म परंपरा प्राणधार श्रध्ये मां भगवती के उपासक एवं भगवताचार्य और त्रिकालदर्शी (चाउर वाले बाबा) की उपाधि से नवाजे गये गुरुजी श्रीश्री पंडित नरेन्द्र नयन शास्त्री जी ने बताया कि मां भगवती को दुर्गा क्यों कहते है ? गुरुजी पंडित नरेन्द्र नयन शास्त्री जी ने बताया कि देवी स्वरूपा मां विमला के पावन पुण्य स्मृति में आज मां भगवती का बहुत ही सुंदर रूप से श्रृंगार किया गया। मां विमला के उन पावन कर्मों को याद करते हैं। आज माता के मंदिर में प्रसाद भोग लगाया गया, हवन पूजा उनके नाम से किया गया।

गुरुजी ने मां भगवती को दुर्गा क्यों कहते है, इसकी जानकारी देते हुए भक्तों को बताया कि मां भगवती के असंख्य नाम हैं लेकिन भक्तों को उनका दुर्गा नाम विशेष प्रिय है। भगवती को दुर्गा नाम प्राप्त होने के पीछे भी एक पौराणिक कथा है। मां भगवती के असंख्य नाम हैं लेकिन भक्तों को उनका दुर्गा नाम विशेष प्रिय है। भगवती को दुर्गा नाम प्राप्त होने के पीछे भी एक पौराणिक कथा है। माना जाता है कि एक बार मां ने अत्यंत पराक्रमी और देवताओं के विरोधी राक्षस का वध किया था। उसके बाद भगवती को दुर्गा नाम मिला। उस दैत्य का नाम दुर्गम था। उसने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और वरदान प्राप्त कर लिया। इसके बाद दुर्गम ने सभी वेदों को अपने वश में कर लिया और यज्ञ का ध्वंस करने लगा। उसका आतंक इतना बढ़ गया कि देवता भी उससे भयभीत होने लगे। उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और पूरा ब्रह्मांड उसके आतंक से कांपने लगा। आखिरकार सभी देवता विनती करते हुए मां भगवती के पास गए और उनसे अपनी व्यथा कही। देवताओं के कष्ट सुनकर मां ने दुर्गम का अंत करने का निश्चय किया। जब दुर्गम को यह बात मालूम हुई तो वह भी माता से युद्ध करने की तैयारी करने लगा। उसने अपनी सेना साथ ली और युद्ध के लिए प्रस्थान किया। युद्ध में भगवती ने उसकी समस्त सेना का संहार कर दिया। फिर भगवती और दुर्गम के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इसमें दुर्गम पराजित हुआ और माता ने उसका वध कर दिया। देवताओं सहित पूरे ब्रह्मांड को दुर्गम के अंत से खुशी मिली, उसके आतंक का अंत हो गया। वहीं, मां भगवती को उनके भक्त दुर्गा नाम से पुकारने लगे। जो भी इस नाम से मां को पुकारता है, वे उसके दुखों-कष्टों का अंत जरूर करती हैं।

आपको बता दें कि गुरुजी पंडित नरेन्द्र नयन शास्त्री जी का जन्म रायपुर जिला अंतर्गत ग्राम सिलयारी में 29.07.1987 को हुआ है, जो राजिम बनारस से शिक्षा प्राप्त हैं। उन्हें संस्कृत में शास्त्री आचार्य की उपाधि मिली है। गुरुजी चायवाले बाबा के नाम से पूरे भारत वर्ष में विख्यात है। सम्मानित श्री गुरुजी हिंदू संस्कृति एवं वैदिक सनातन धर्म के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु पूरे देश में भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का प्रसाद बांट चुके है।



















