हिंसा आज हमारे समय की भाषा बनती जा रही है और लोग गुस्से से भरे हुए हैं। सामाजिक विभाजन की रक्तरंजित तस्वीरें सोशल मीडिया पर बिखरी पड़ी हैं। व्यस्त सड़कों पर दिनदहाड़े हत्याएं हो रही हैं, दहेज के लिए महिलाओं की जान ली जा रही है और हर मिनट 7 बलात्कार होने की बात सामने आती है। अब वीभत्स से वीभत्स हिंसा भी हमें विचलित नहीं करती। विकसित भारत में क्रूरता और पाशविकता मानो एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं।
पश्चिम बंगाल में एक उन्मादी भीड़ धर्म के नाम पर एक ईसाई महिला को निर्वस्त्र करने पर उतारू हो जाती है। तमिलनाडु में शिक्षक गोमांस खाने वाले एक विद्यार्थी को आत्महत्या करने की नौबत तक पहुंचा देते हैं। गुजरात में नवरात्रि समारोहों में मुस्लिमों की भागीदारी रोकने के लिए नर्तक अड़ जाते हैं। इन घटनाओं के बीच समाज का एक वर्ग ऐसा दिखाई देता है, जो न केवल गुस्से के साथ सहज होता जा रहा है, बल्कि हिंसा के प्रति भी उदासीन बनता जा रहा है। आखिर उस राष्ट्र को क्या हो गया है, जो अपनी सभ्यतागत प्रज्ञा पर गर्व करता है? आस्था कब अपमानित करने का लाइसैंस बन गई? खान-पान कब सांप्रदायिक उकसावे का विषय हो गया और असहमति कब हिंसा को आमंत्रण देने लगी? क्या धार्मिक पहचानें एक-दूसरे को परखने, डराने और बहिष्कृत करने के हथियार बनती जा रही हैं? हमारी मानवीय संवेदना आखिर कहां खो गई है?
एक समुदाय से जुड़ी घटना राष्ट्रीय संकट बन जाती है, जबकि दूसरे समुदाय से संबंधित उतनी ही चिंताजनक घटना को शायद ही उतना ध्यान मिलता है। राजनेता अपने विरोधियों की निंदा करने, अपने समर्थकों का बचाव करने या पीड़ित की परिस्थितियों पर सवाल उठाने के लिए दौड़ पड़ते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि मानवीय पीड़ा के साथ भी भेदभाव होने लगता है। भारत आज केवल कानून-व्यवस्था के संकट का सामना नहीं कर रहा, वह अपने विवेक और अंतरात्मा के संकट से भी जूझ रहा है। जरा सोचिए, भीड़ हमला करती है, संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है, टकराव बढ़ता है, वीडियो प्रसारित होते हैं और नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं। फिर कोई नई घटना घट जाती है और कल की त्रासदी हमारी स्मृति से ओझल हो जाती है।
क्या हम एक-दूसरे की पीड़ा के महज दर्शक बनकर रह गए हैं? क्या हम यह तय करने से पहले कि किसी पीड़ित की तकलीफ पर सहानुभूति जतानी चाहिए या नहीं, उसकी धार्मिक पहचान, जाति, विचारधारा अथवा राजनीतिक संबद्धता देखते हैं? यदि किसी समुदाय की आस्था का उत्सव मनाने के लिए दूसरे समुदाय का अपमान या बहिष्कार आवश्यक हो जाए, तो आखिर हम किस बात का उत्सव मना रहे हैं? यह मानवीय मूल्यों के पतन की खतरनाक दिशा है, क्योंकि आक्रोश और संवेदना के मामले में दोहरे मापदंड अपनाकर मानवता कायम नहीं रह सकती। सामाजिक तनाव, आर्थिक चिंताएं, भ्रामक सूचनाएं, राजनीतिक ध्रुवीकरण और भड़काऊ सामग्री का पलभर में व्यापक प्रसार, ये सभी इसके लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन राजनीतिक नेतृत्व की भी बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि उसके शब्द तनाव कम कर सकते हैं या फिर शत्रुता को वैधता प्रदान कर सकते हैं।
हर राजनीतिक दल त्रासदी को राजनीतिक लाभ में बदलने की कोशिश करता है और हर विचारधारा के अपने अनुयायियों के गलत कार्यों को नजरअंदाज करने का खतरा बना रहता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक घटना के लिए सभी राजनीतिक दल समान रूप से जिम्मेदार हैं या हर विवाद के कारण एक जैसे हैं। जिम्मेदारी का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। लेकिन जवाबदेही का सिद्धांत चुनावी सुविधा के अनुसार नहीं बदल सकता। कोई अपराध केवल इसलिए कम गंभीर नहीं हो जाता कि आरोपी किसी पसंदीदा राजनीतिक खेमे से जुड़ा है। इसी तरह, किसी आरोप के आधार पर पूरे धार्मिक समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता। देशभक्ति का आकलन इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कोई व्यक्ति दूसरे भारतीय के प्रति कितनी शत्रुता रखता है। यदि हम अपनी सभ्यता के सर्वोच्च आदर्शों का उल्लेख तो करते हैं लेकिन सामने खड़े इंसान को बुनियादी गरिमा तक नहीं दे सकते, तो ऐसे दावों का क्या औचित्य है?
भारत नफरत को आस्था का मुखौटा पहनने, भीड़ को नैतिकता का स्वयंभू प्रहरी बनने और क्रूरता को सांस्कृतिक गौरव बताने की छूट देकर स्वयं को विश्वगुरु नहीं कह सकता। समाधान धर्म को त्यागने, सांस्कृतिक गौरव को दबाने या जनाक्रोश को खामोश करने में नहीं है। अन्याय, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शासन की विफलताओं के विरुद्ध भारतीयों के आक्रोश के जायज कारण हो सकते हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति और विरोध के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए। लेकिन संयमहीन आक्रोश प्रतिशोध बन जाता है। करुणा से रहित आस्था कट्टरता में बदल जाती है। और सहनागरिकों के प्रति सम्मान के बिना राष्ट्रवाद महज खोखला प्रदर्शन बनकर रह जाता है। भारत को ऐसे नेताओं की जरूरत नहीं, जो हर सुबह एक नया शत्रु खड़ा कर दें। देश को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है, जो समझता हो कि विविधताओं से भरे राष्ट्र का संचालन करने के लिए संयम, निष्पक्षता और उस समय भी नफरत के विरुद्ध खड़े होने का साहस चाहिए, जब इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़े। आगे का रास्ता न तो जटिल है और न ही दिखावटी। कानून को निष्पक्षता से लागू किया जाए।
आरोपों की जांच सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से मुक्त होकर हो। हिंसा के दोषियों को दंडित किया जाए। भड़काऊ बयान देने वाले राजनीतिक नेताओं को जवाबदेह ठहराया जाए। शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा की जाए लेकिन धमकी, डराने-धमकाने और विनाशकारी गतिविधियों को रोका जाए। कोई राष्ट्र इस आधार पर शक्तिशाली नहीं बनता कि वह कितने लोगों को चुप करा सकता है, अपमानित कर सकता है या बाहर कर सकता है। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में है कि वह अलग विचारों और पहचानों वाले लोगों को भी कितनी गरिमा और सुरक्षा प्रदान करता है। हिंसा अस्वीकार्य है। कठोर और समयबद्ध कार्रवाई अनिवार्य है। अन्यथा, जैसा कि मिर्जा फिदवी के कथन के रूप में उद्धृत पंक्तियां कहती हैं-‘लोकतंत्र का जनाजा है, जरा धूम से निकले।’-पूनम आई. कौशिश



















