मुंबई। बंबई हाईकोर्ट ने पत्नी के उत्पीडऩ के लिए 35 साल के एक व्यक्ति की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि पति के लिए चाय बनाने से इनकार करना कहीं से भी इस बात की इजाजत नहीं देता कि यह एक उकसावे वाली कार्रवाई है जिसके लिए वह पत्नी को पीटे. इसके साथ ही कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि पत्नी कोई ‘गुलाम या वस्तु’ नहीं है. हाल ही में इसी महीने जारी अपने एक आदेश में जस्टिस रेवती मोहिते देरे ने कहा कि शादी आदर्श रूप में समानता पर आधारित एक समझौता है. कोर्ट ने आगे कहा, लेकिन पितृसत्ता का भाव और यह विचार कि औरत पुरुष की संपत्ति है अब भी समाज में व्यापक तौर पर चलन में है, जिससे पुरुष यह सोचने लगता है कि उसकी पत्नी उसकी गुलाम है. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उनकी 6 साल की बेटी की गवाही भरोसे को और पुख्ता करती है और उस पर यकीन करने से इनकार नहीं किया जा सकता. सोलापुर जिले के पंढरपुर निवासी संतोष अटकार (35 साल) को 2016 में एक स्थानीय अदालत ने 10 साल की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने कायम रखा.

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