स्वामी विवेकानंद-एक ऐसा नाम, जो भारतीय इतिहास में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार, उपदेशों और चिंतन के प्रतीक हैं. जिन्हें विश्व में भारतीय सिद्धांतो और वैश्विक बंधुत्व का ज्ञान देने के साथ ही युवाओं को प्रेरित करने के लिए आज भी जाना जाता है. स्वामी विवेकानंद ने अपने छोटे से जीवनकाल में ही काफी ज्ञान अर्जित किया और उसे बांटा भी, जो उनकी प्रतिभा के बारे में बताता है. लेकिन उनकी प्रतिभा सिर्फ धर्म, संस्कृति और दर्शन तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि शारीरिक गतिविधियों में भी वह पीछे नहीं थे और इसका एक बड़ा उदाहरण क्रिकेट के खेल में उनके कमाल से मिलता है. एक ऐसा किस्सा, जिसके बारे में आज भी कम ही लोगों को पता है. वह किस्सा, जो स्वामी विवेकानंद बनने से पहले नरेंद्रनाथ दत्त के बारे में है. 20 साल का वो हिंदुस्तानी, जिसने अंग्रेजों के खेल में उनको ही पस्त कर दिया था. बात 1880 के दौर की है, जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था. कलकत्ता तब भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी थी. कलकत्ता में ही रहने वाले नरेंद्रनाथ का स्वामी विवेकानंद के रूप में परिवर्तन होने से पहले वह अलग-अलग खेलों में अपना हुनर आजमाते थे. वह शारीरिक गतिविधियों पर खूब जोर देते थे. वह फुटबॉल भी खेलते थे, तो पहलवानी, कुश्ती और बॉक्सिंग में भी अपना दम दिखाते थे. ऐसे में उन्हें एक बार मौका मिला क्रिकेट में हाथ आजमाने का और अकूत प्रतिभा के धनी नरेंद्रनाथ ने अपना दम दिखाया.
अंग्रेजों के खिलाफ खेलने का मिला मौका, तो बरपाया कहर
द ब्रिज के एक आलेख में उस क्रिकेट मैच में नरेंद्रनाथ के कमाल का जिक्र है. अंग्रेज अधिकारियों के चलाए जाने वाले कलकत्ता क्रिकेट क्लब और स्थानीय बंगालियों द्वारा शुरू किए गए टाउन क्लब के बीच ये मुकाबला हुआ था. ये मुकाबला हुआ था ऐतिहासिक ईडन गार्डन्स में, जो तब सिर्फ 20 साल पुराना ही था. कहानी ये है कि स्वंतत्रता सेनानी हेमचंद्र घोष ने एक बार नरेंद्रनाथ से पूछा कि क्या वे अंग्रेजों के खिलाफ उनके क्लब की ओर से खेलना चाहेंगे? ये वो दौर था जब अंग्रेजों को किसी भी रूप में परास्त करने या उनसे आगे निकलने का जोश और जुनून हर भारतीय के अंदर था. जाहिर तौर पर युवा नरेंद्र के लिए भी हां बोलना कोई मुश्किल बात नहीं थी. बस फिर क्या था. हेमचंद्र दा ने नरेंद्रनाथ को थोड़ा समझाया. जज्बातों के बजाए बस अपने कौशल का इस्तेमाल करने को कहा. ध्यान सिर्फ गेंदबाजी पर देने के लिए कहा और अपने पूरे जीवन में हर बात को जल्दी और बखूबी समझने वाले नरेंद्रनाथ ने क्रिकेट को भी समझ लिया और फिर बरपाया अपनी गेंदबाजी का कहर. रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईडन गार्डन्स में अंग्रेज बल्लेबाजों के पांव उखड़ गए थे. स्कोरबोर्ड पर सिर्फ 20 रन चढ़ सके थे कि 7 विकेट गिर गए. ये सातों विकेट नरेंद्रनाथ ने लिए थे. निश्चित रूप से ऐसा कमाल करने वाला खिलाड़ी क्रिकेट में आगे न बढ़े, ये जानकर तो हर कोई हैरान होगा. लेकिन वो दौर ही ऐसा था, कि जब क्रिकेटर बनने के बारे में सोचा नहीं जाता था, क्योंकि सामने लक्ष्य और जरूरतें अलग और बड़ी थीं. जाहिर तौर पर नरेंद्रनाथ के लक्ष्य भी अलग थे और उन्होंने उन्हीं के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया. रामकृष्ण परमहंस के रूप में उन्हें एक गुरु और एक मार्गदर्शक मिले, जिनसे मिले ज्ञान के बाद नरेंद्रनाथ ने स्वामी विवेकानंद का रूप अपनाया. फिर रामकृष्ण मिशन की स्थापना से लेकर शिकागो सम्मेलन तक भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के प्रसार के लिए खुद को न्यौछावर कर दिया.

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