रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य सँयुक्त पेन्शनर फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव ने वित्त विभाग द्वारा जारी अक्टूबर 21 से राज्य के पेंशनरों के लिये जारी महँगाई राहत के आदेश बुजुर्गों के साथ बेईमानी करार देते हुये आरोप लगाया है कि वित्त विभाग ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा विगत 3 सितम्बर 21 को कर्मचारियों और पेंशनरों दोनों को जुलाई 21 से 5% महंगाई भत्ता देने की घोषणा को झूठा साबित दिया है। यह पेंशनरों के साथ सरासर धोखा है। यह ब्यूरोक्रेसी के सरकार पर हावी होने का प्रमाण है। उन्होंने ट्वीट कर अपने किये गये घोषणा अनुसार आदेश में सुधार कर कर्मचारियों की तरह जुलाई 21 से 5% महंगाई राहत देने की मांग की है।

जारी विज्ञप्ति में छत्तीसगढ़ राज्य सँयुक्त पेंशनर्स फेडरेशन के अध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव, छत्तीसगढ़ पेंशनधारी कल्याण संघ के प्रांताध्यक्ष डॉ डी पी मनहर, पेंशनर्स एसोसिएशन के प्रांताध्यक्ष यशवन्त देवान, प्रगतिशील पेंशनर कल्याण संघ के प्रांताध्यक्ष आर पी शर्मा,भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ छत्तीसगढ़ प्रदेश के अध्यक्ष जे पी मिश्रा तथा पेंशनर समाज के अध्यक्ष ओ पी भट्ट ने संयुक्त बयान में कहा है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों राज्य सरकारों ने आपसी मिलीभगत कर पेंशनरों एवं परिवार पेंशनरों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, बुजुर्गो की हक की रकम पर डाका डाल रहे हैं। विगत 21 वर्षों से मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की छटवीं अनुसूची की धारा 49 को दोनों राज्यो के बीच आर्थिक स्वत्वों के भुगतान में आपसी सहमति की अनिवार्य बाध्यता की शर्त बताकर बुजुर्ग पेंशनर्स के साथ मजाक करते आ रहें हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि धारा 49 को ढाल बनाकर मध्यप्रदेश सरकार पेंशनरों के बहाने छत्तीसगढ़ सरकार को 21 वर्षो से लगातार लूट रही है और छत्तीसगढ़ सरकार को पता नही है। इन 21 वर्षो में छत्तीसगढ़ सरकार आपसी सहमति के नाम पर अरबो रुपये लुटा है और इसके केवल राज्य के ब्यूरोकेट जिम्मेदार है। जारी विज्ञप्ति में आगे बताया गया है कि धारा 49 के अनुसार छत्तीसगढ़ के 1 लाख और 5 लाख पेंशनरों को इस तरह कुल 6 लाख पेंशनर्स मध्यप्रदेश 74% और छत्तीसगढ़ 26% राशि वहन करती हैं। इसलिए बजट लेने आपसी सहमति की जरूरत होती है और छत्तीसगढ़ को इस भुलावे में रखा गया है कि उन्हें केवल 26% ही भुगतान करना होता हैं जो 74% से बहुत कम है जबकि वास्तविकता इसके ठीक उल्टा है।

उन्होनें उदाहरण देते हुये बताया है कि प्रत्येक पेंशनर को नियमानुसार 74% राशि मध्यप्रदेश द्वारा और 26% राशि छत्तीसगढ़ द्वारा दिया जाना है अर्थात 100 रुपये में 6 लाख पेंशनर को मध्यप्रदेश से 74%और इन्ही सभी पेंशनरों को 26त्न छत्तीसगढ़ सरकार के खजाने से देने पड़ेंगे। हिसाब लगाने पर इसमें मध्यप्रदेश को 44 करोड़ 44 लाख व्यय करना पड़ेगा और छत्तीसगढ़ सरकार को 1करोड़ 56 लाख व्यय होगा। परन्तु यदि मध्यप्रदेश अपने 5 लाख पेंशनर को 100 % भुगतान करता है उसे 5 करोड़ और छत्तीसगढ़ सरकार अपने 1 लाख पेंशनरों के केवल 1 करोड़ खर्च करने होंगे। इस तरह केवल 100 रुपये के भुगतान में ही छत्तीसगढ़ शासन को 56 लाख रुपए का नुकसान हो रहा है। इसीलिए मध्यप्रदेश सरकार जानबूझकर 20 साल से पेंशनरी दायित्व को टालते आ रही है जबकि छत्तीसगढ़ राज्य के बने नये राज्य उत्तराखंड और झारखंड में यह समस्या नहीं है। इस बात को ध्यान बार बार ध्यान में लाने पर आईएएस एक ही जवाब देते हैं वहाँ की स्थिति का पता यहां भी कार्यवाही की जायेगी परन्तु 21 वर्ष से केवल यही सुनते आ रहे हैं और राज्य के पेंशनरों के साथ बेईमानी लगातार जारी है। इस मामले को मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाने प्रयास में लाने के लगातार प्रयास के बाद उनसे मुलाकात और बात नही होने के कारण प्रदेश भर के पेंशनर्स नए साल में 03 जनवरी 22 को मंत्रालय के सामने प्रदर्शन और घेराव करने का नोटिस सरकार को दिया है।

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