दरअसल अयोध्या के सबसे प्राचीन पीठ तपस्वी छावनी के पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को एक पत्र लिखा है, उन्होंने कहा कि अगर अहिल्या रूपी पत्थर पर छेनी-हथौड़ी चली तो तबाही आ सकती है. सैकड़ों वर्षों के संघर्षों और बलिदानों के बाद आखिरकार वो दिन आ ही गया जब प्रभु श्रीराम अपनी जन्मभूमि में विराजमान होंगे. ठीक 11 महीने बाद राम लला अपने गर्भ गृह में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे. ऐसे में राम लला की प्रतिमा बनाए जाने के लिए नेपाल के जनकपुर से दो शिलाएं धर्म नगरी अयोध्या पहुंची हैं. लेकिन शिलाओं की धार्मिक मान्यताओं और राम भक्तों की आस्था के कारण अब एक नया विवाद शुरू हो गया है. दरअसल जनकपुर के जानकी मंदिर के महंत और नेपाल के उप प्रधानमंत्री की मौजूदगी में ट्रस्ट के पदाधिकारियों को शालिग्राम शिला तो सौंप दी गई है. लेकिन पत्थर की धार्मिक मान्ताओं को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है. चलिए कुछ तस्वीरों के जरिए आपको समझाते हैं क्या धार्मिक मान्यता और नया विवाद.

अयोध्या पहुंची शालिग्राम शिला नेपाल की पवित्र नदी गंडकी के तट पर मिलती है. ऐसा माना जाता है कि यह शिला आज से करीब 6 करोड़ वर्ष पुरानी है. शिला में श्रीहरि विष्णु का वास: अयोध्या पहुंची शिलाओं को लेकर ऐसी धार्मिक मान्यताएं है कि इस शिला में श्रीहरि विष्णु का वास होता है. इसी शिला को नारायण के स्वरूप में पूजा भी जाता है. इतनी ही इस शिला में श्रीहरि विष्णु के साथ-साथ माता लक्ष्मी जी का भी वास होता है
शालिग्राम की नहीं होती प्राण-प्रतिष्ठा: श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी जी का स्वयं स्वरूप होने के कारण शालिग्राम शिला की प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जाती है. इस पत्थर को सीधे-सीधे स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू कर दी जाती है. बड़ा पत्थर: नेपाल से प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या दो शालिग्राम शिलाएं लाई गई हैं. शालिग्राम की बड़ी शिला से प्रभु श्रीराम की मूर्ति निर्माण की बात चल रही है. यही कारण है कि भक्त पत्थर को राम लला का स्वरूप मान पूजा-अर्चना करने लगे हैं. छोटा पत्थर: शालिग्राम की दूसरी छोटी शिला को लेकर कई बातें सामने आ रही हैं. कोई माता जनकी की मूर्ति निर्माण की बात कर रहा है तो प्रभु लक्ष्मण की तो कई कह रहा है कि, सभी भाईयों की मूर्तियां बनाई जाएंगी.

धार्मिक मान्यताएं: अयोध्या के सबसे प्राचीन पीठ तपस्वी छावनी के पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने यह मांग की है कि अगर शालिग्राम शिला पर छेनी-हथौड़ी चली तो मैं अन्य जल का परित्याग कर दूंगा. विवाद का कारण: पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंस आचार्य का कहना है कि शालिग्राम शिला अपने आप में स्वयं नारायण की स्वरूप है. ऐसे में भगवान के उपर छेनी और हथौड़े से प्रहार स्वीकार नहीं होग. यदि ऐसा होगा तो देश औकर दुनिया में भयंकर तबाही आएगी. शालिग्राम पूजा के लिए भक्तों का तांता: वहीं जब से शालिग्राम पत्थर रामनगरी पहुंचा है पूजा-अर्चना के लिए राम भक्तों का तांता लगा हुआ है. लाखों की संख्या में पहुंचे भक्त प्रभु श्रीराम का स्वरूप मानकर आपने आराध्य को प्रणाम कर रहे हैं. भक्ति कर रहे हैं, आशीर्वाद ले रहे हैं.

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