एक अमरीकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत 95 तक पहुंच चुकी है। अर्थात् हम 95 रुपए खर्च कर एक डॉलर प्राप्त कर सकते हैं अथवा अंतरराष्ट्रीय व्यापार कर सकते हैं। ‘रुपए’ का लगातार अवमूल्यन होता रहा है। डॉलर ही नहीं, ब्रिटिश मुद्रा ‘पौंड’ के लिए भी हमें 123.84 रुपए खर्च करने होंगे और यूरोप की मुद्रा ‘यूरो’ की कीमत भी 108 रुपए से अधिक है। ‘रुपया’ लगातार कमजोर होता रहा है, उसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है और आयात-बिल भी महंगे होते रहे हैं। 2013-14 के संसदीय चुनाव के दौरान भाजपा ने ‘रुपए’ को भारत की संप्रभुता और प्रतिष्ठा से जोड़ कर एक संवेदनशील मुद्दा बना दिया था। लोगों ने विश्वास किया और जनादेश भाजपा को दिया। मोदी सरकार के करीब 12 साल के कालखंड में ‘रुपए’ में करीब 61 फीसदी की गिरावट दर्ज हो चुकी है और यह सिलसिला अभी जारी है। यह बेहद गंभीर मौद्रिक स्थिति है, बेशक भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इस मुद्दे को आसानी से यूं समझा जा सकता है कि फरवरी, 2026 में ईरान युद्ध से पहले कच्चे तेल की कीमत 69 डॉलर प्रति बैरल थी। तब हमें एक बैरल कच्चा तेल 6700 रुपए से कुछ अधिक में पड़ता था, लेकिन मार्च में वही तेल 10,640 रुपए बैरल में खरीदा जा रहा है। यानी कीमत 70 फीसदी बढ़ी है, लिहाजा आम आदमी को भी महंगा पेट्रोल-डीजल खरीदना पड़ेगा। बेशक कुछ विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सरकार ने पेट्रोल-डीजल महंगे नहीं किए हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 117 डॉलर प्रति बैरल तक उछल चुके हैं। भाजपा तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को लगातार निशाना बनाती थी, जबकि उन्होंने ही देश को आर्थिक मंदी से बचाया था। तब भाजपा अर्थव्यवस्था की कमजोरी और ‘रुपए’ के अवमूल्यन पर चिंताएं जताती थी। मौजूदा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण उस दौर में भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता थीं। ‘रुपए’ की स्थिति को लेकर यूपीए और भाजपा-एनडीए सरकारों की तुलना करना बेहद तार्किक है।

तब मई, 2004 में मनमोहन सरकार के शुरुआती दिनों में एक डॉलर की तुलना में ‘रुपया’ 45.37 पर था। मई, 2014 में यूपीए कालखंड की समाप्ति के वक्त डॉलर की कीमत 58.58 रुपए थी। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार आई, तो ‘रुपए’ का अवमूल्यन लगातार क्यों होता रहा है? डॉलर 58 रुपए से उछल कर 90-91 रुपए तक कैसे पहुंच गया? आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रिजर्व बैंक दखल न दे, तो एक डॉलर 110 रुपए में पड़ सकता है। ईरान युद्ध की शुरुआत के एक दिन पहले, 27 फरवरी, तक ‘रुपया’ 90.98 तक गिरा था, लेकिन 31 मार्च, 2026 को 95 तक गिर गया। 100 रुपए की ‘चरम स्थिति’ कितनी दूर है? बेशक मोदी कालखंड में ‘रुपए’ का अवमूल्यन ऐतिहासिक रहा है और भारतीय मुद्रा के लिए यह असंतुलित और गंभीर स्थिति है। इसके बावजूद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बयान आया है कि ‘रुपया’ ठीक चल रहा है। 2022 में उन्होंने अपना ‘आर्थिक दर्शन’ देश के सामने पेश किया था कि ‘रुपया’ कमजोर नहीं हुआ है, बल्कि डॉलर मजबूत हो रहा है। हालांकि ‘रुपए’ के अवमूल्यन का युद्ध से कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन हमारा आयात युद्ध के कारण महंगा होता जा रहा है, तो हमें आयात के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है। बेशक भारत में विदेशी मुद्रा का भंडार 700 अरब डॉलर के करीब है और यह 10 माह के आयात के लिए पर्याप्त है, लेकिन हमें आगे की योजना भी तैयार करनी चाहिए। भारत की उम्र मात्र 10 माह नहीं है। इस स्थिति पर भारतीय स्टेट बैंक की एक रपट सामने आई है, जिसमें ‘रुपए’ की गिरावट के कुछ कारणों को गिनाया गया है। रपट में माना गया है कि ‘रुपए’ को अब ‘शॉक एब्जॉर्बर’ बना कर छोडऩा सही नहीं है। इसका उलटा असर पड़ रहा है। सुझाव दिया गया है कि रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करके ‘करेंसी मार्केट’ में आक्रामक रुख अपनाना चाहिए। पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करना जरूरी है। रिजर्व बैंक को छोटी अवधि के बॉन्ड बेच कर लंबी अवधि के बॉन्ड खरीदने चाहिए। ब्याज दर संतुलित रहेगी। बहरहाल यह मुद्दा ऐसा है, जिस पर प्रधानमंत्री को कैबिनेट में विमर्श कर देश को संबोधित करना चाहिए। जहां तक विकास की बात है, भारत अभी अमरीका की तुलना में चवन्नी और चीन की तुलना में अठन्नी के बराबर है। तात्पर्य यह है कि भारत को विकास की दृष्टि से अभी लंबा सफर तय करना है। महज यह कह कर बात नहीं बनेगी कि भारत में विकास दर विश्व के अन्य देशों की तुलना में ज्यादा है। हर आदमी तक रोजगार, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना अभी शेष है

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