आंध्र प्रदेश के विजयनगरम-सलूर क्षेत्र में प्राचीन चट्टानों के एक अध्ययन ने एक बड़ा खुलासा किया है। इसके निर्णायक सबूत मिले हैं कि भारत और अंटार्कटिका कभी भौतिक रूप से एक विशाल पर्वत बेल्ट के रूप में जुड़े हुए थे। इसे रेनर-पूर्वी घाट ओरोजेन के नाम से जाना जाता है। जो लोग नहीं जानते, उनके लिए बता दें कि रेनर प्रांत आज के पूर्वी अंटार्कटिका में स्थित है।
लाखों साल पहले हुआ अलगाव
शोधकर्ताओं ने पाया कि दोनों क्षेत्रों की चट्टानों की उम्र, रासायनिक निशान और खनिज संरचना एक जैसी है। उन्होंने यह भी पाया कि चट्टानें भूवैज्ञानिक इतिहास के उन्हीं तीन चरणों से गुज़री हैं, जो इस बात का पुख्ता सबूत देता है कि पूर्वी भारत और पूर्वी अंटार्कटिका लाखों साल पहले अलग होने से पहले कभी आपस में जुड़े हुए थे। शोध टीम में प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कोलकाता के शुभदीप रॉय, शंकर बोस, सायंतिका घोष, स्नेहा मुखर्जी, निलंजना सरकार और जे अमल देव; क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी, ऑस्ट्रेलिया; नेशनल सेंटर फ़ॉर अर्थ साइंस स्टडीज़, तिरुवनंतपुरम; और कोरिया पोलर रिसर्च इंस्टीट्यूट, रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया शामिल थे।
शोध के लिए उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल
शोधकर्ताओं ने ग्रेनुलाइट्स नामक चट्टानों का अध्ययन किया, जो एक प्रकार की कायांतरित चट्टानें हैं और पृथ्वी के बहुत अंदर, अत्यधिक गर्मी और दबाव में बनती हैं। नतीजतन, ये चट्टानें उन प्राचीन घटनाओं का रिकॉर्ड सहेज कर रखती हैं जो पृथ्वी की पपड़ी के बहुत अंदर घटित हुई थीं। TOI से बात करते हुए, प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी में प्राकृतिक और गणितीय विज्ञान संकाय के डीन प्रो. शंकर बोस ने बताया कि टीम ने आंध्र प्रदेश के विजयनगरम-सलूर में ज़िरकॉन, गार्नेट और मोनाज़ाइट जैसे खनिजों की जांच के लिए खनिज विश्लेषण की उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया।
ऐसे किया गया शोध
भूविज्ञान संकाय के सदस्य ने कहा कि खास बात यह है कि ज़िरकॉन अपनी उस मज़बूती के लिए मशहूर है जो इसे अत्यधिक गर्मी और दबाव में भी सुरक्षित रखती है, जबकि इसी गर्मी और दबाव में दूसरे खनिज नष्ट हो सकते हैं। अपनी इसी मज़बूत प्रकृति के कारण, ज़िरकॉन इन चट्टानों के भीतर एक छोटे ‘टाइम कैप्सूल’ का काम करता है। ज़िरकॉन क्रिस्टल के भीतर मौजूद यूरेनियम और सीसा जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय का अध्ययन करके हम एक विस्तृत समय-रेखा तैयार कर पाए, जिससे उन घटनाओं की सटीक जानकारी मिली जो पूर्वी घाट क्षेत्र में करोड़ों से लेकर अरबों साल पहले घटित हुई थीं।
छोटे क्रिस्टल, बड़े सुराग
शोध करने वाली टीम के प्रो. बोस ने कहा कि जो मिला, वह बेहद चौंकाने वाला था। विजयनगरम और सालूर की चट्टानों में भूवैज्ञानिक इतिहास के वही तीन मुख्य चरण पाए गए हैं, जिनकी पहचान पहले ही पूर्वी अंटार्कटिका में हो चुकी है। पहला चरण लगभग 1,000 से 990 मिलियन वर्ष पहले हुआ था। इस दौरान, चट्टानें पृथ्वी की पपड़ी के काफी अंदर लगभग 1,000 डिग्री सेल्सियस के अत्यधिक उच्च तापमान के संपर्क में आईं – जो लगभग लावा जितना ही गर्म था। जब वे भूभाग, जो आगे चलकर भारत और अंटार्कटिका बने, आपस में टकराए, तो उन्होंने एक विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण किया, जिसे ‘रेनर-ईस्टर्न घाट ओरोजेन’ के नाम से जाना जाता है।
ऐसे अंटार्कटिका से अलग हुई चट्टान
दूसरा चरण लगभग 950 से 890 मिलियन वर्ष पहले हुआ था। वैज्ञानिक इसे ‘रीवर्किंग’ (पुनर्निर्माण) का काल बताते हैं। चट्टानें फिर से गर्म हुईं या और भी गहराई में दब गईं, और उनकी खनिज संरचनाओं में एक बार फिर बदलाव आया। इतना लंबा और जटिल इतिहास आमतौर पर महाद्वीपीय टकराव से बनी प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं की विशेषता होती है। तीसरा चरण बहुत बाद में आया, लगभग 570 से 540 मिलियन साल पहले के बीच। इस दौरान, रासायनिक रूप से समृद्ध तरल पदार्थ चट्टानों की दरारों और परतों से होकर गुज़रे। इस तरल गतिविधि ने एक विशिष्ट रासायनिक निशान छोड़ दिया। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह गोंडवाना के निर्माण से जुड़ी दूर की टेक्टोनिक ताकतों से जुड़ा था।
भले ही मुख्य टकराव कहीं और हो रहे थे, लेकिन तनाव और तरल पदार्थों की हलचल इस क्षेत्र तक पहुंची और चट्टानों को एक पहचानने योग्य तरीके से बदल दिया। तरल पदार्थों से जुड़ा यही निशान भारतीय और अंटार्कटिक, दोनों नमूनों में दिखाई देता है, जिससे इस बात को और बल मिलता है कि उनका भूवैज्ञानिक इतिहास एक ही था।
बड़ा विभाजन और महाद्वीपों का खिसकना
पहले के अध्ययनों के अनुसार, लगभग 130 से 150 मिलियन साल पहले, डायनासोर के युग के दौरान, सुपरकॉन्टिनेंट गोंडवाना टूटना शुरू हो गया था। एक विशाल दरार खुली और धीरे-धीरे चौड़ी होकर वह बन गई जिसे आज हम हिंद महासागर कहते हैं। भारत उत्तर की ओर एशिया की तरफ खिसकने लगा, जबकि अंटार्कटिका दक्षिण की ओर ध्रुव की तरफ बढ़ने लगा। कभी आपस में जुड़ी हुई पर्वत श्रृंखला टूटकर अलग हो गई और अलग-अलग महाद्वीपीय प्लेटों पर बहकर दूर चली गई। आज, हज़ारों किलोमीटर का महासागर इन दोनों क्षेत्रों को अलग करता है। वैज्ञानिक आज भी उनके साझा अतीत का पता लगा सकते हैं, क्योंकि चट्टानों ने उसी प्राचीन भूवैज्ञानिक इतिहास को अपने भीतर सुरक्षित रखा है।
यह क्यों मायने रखता है
आज पूर्वी घाटों के नीचे की ज़मीन भले ही स्थिर लगती हो, लेकिन ये चट्टानें एक अरब साल के दौरान अत्यधिक गर्मी, ज़मीन की गहराई में दबे रहने, रासायनिक बदलाव और महाद्वीपीय यात्रा की कहानी बयां करती हैं। इन्होंने 1,000 डिग्री सेल्सियस के करीब तापमान को भी झेला, एक से ज़्यादा बार इनमें बदलाव हुए, और बाद में ये उस विशाल भूभाग का हिस्सा बन गईं जो अंटार्कटिका में मौजूद अपने प्राचीन जुड़वां हिस्से से बहुत दूर खिसक गया। इस भूवैज्ञानिक घड़ीनके अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर, वैज्ञानिक इस बात का बेहतर अनुमान लगा सकते हैं कि वर्तमान भूवैज्ञानिक प्रक्रियाएं किस तरह आगे बढ़ेंगी। यह प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और भूकंप जैसे भूवैज्ञानिक जोखिमों का आकलन करने के लिए बेहद जरूरी है।



















