पाकिस्तान और चीन के रिश्तों को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है. Drop Site News की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ग्वादर पोर्ट को चीन के स्थायी सैन्य अड्डे में बदलने के लिए तैयार हो गया था. लेकिन इस डील के बदले उसने ऐसी मांगें रख दीं, जिन्होंने पूरे खेल को पलट दिया. यह मांग सीधे तौर पर भारत के खिलाफ होने वाली थी और आखिरकार चीन ने अपना हाथ खींच लिया. रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने पर्दे के पीछे चीन को संकेत दिया कि वह ग्वादर को स्थायी चीनी नौसैनिक अड्डा बनने देगा, जिससे चीन को हिंद महासागर में बड़ी रणनीतिक बढ़त मिलती.

पाकिस्तान की कौन सी शर्त नहीं आई पसंद?

  1. पाकिस्तान की मांग थी कि बेस देने के बाद अमेरिका की संभावित कार्रवाई से पूरी सुरक्षा मिले. चाहे वह डिप्लोमैटिक फ्रंट पर हो या आर्थिक फ्रंट पर.
  2. भारत के मुकाबले सेना और खुफिया क्षमता को मजबूत करने में मदद. यानी पाकिस्तान चाहता था कि उसकी के साथ-साथ ISI भी रॉ जैसी मजबूत हो.
  3. तीसरी और सबसे खतरनाक मांग थी, समुद्र आधारित परमाणु सेंकेंड्री स्ट्राइक की क्षमता. यही वह मांग थी, जिसके लिए चीन तैयार नहीं हुआ.

सबसे खतरनाक मांग क्या थी?

तीसरी मांग ही पूरी डील की सबसे संवेदनशील और विस्फोटक कड़ी थी. समुद्र आधारित ‘सेकंड स्ट्राइक’ का मतलब है, अगर दुश्मन पहले परमाणु हमला कर दे और जमीन पर मौजूद मिसाइलें खत्म हो जाएं, तब भी समुद्र में छिपी परमाणु पनडुब्बियों से जवाबी हमला किया जा सके. यानी यह क्षमता किसी देश को लगभग ‘अजेय परमाणु ताकत’ बना देती है. भारत के पास यह क्षमता मौजूद है.

पाकिस्तान को यह ताकत मिलती तो क्या होता?

अगर पाकिस्तान को यह क्षमता मिल जाती तो भारत के खिलाफ परमाणु संतुलन पूरी तरह बदल जाता. दक्षिण एशिया में हथियारों की दौड़ तेज हो जाती. इसके अलावा समुद्र में छिपकर हमला करने का खतरा कई गुना बढ़ जाता. वहीं यह ताकत पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और तनाव बढ़ जाता. यानी यह सिर्फ एक सैन्य अपग्रेड नहीं, बल्कि पूरे इलाके की रणनीतिक तस्वीर बदलने वाली मांग थी.

पाकिस्तान ने क्यों नहीं मानी चीन की बात?

रिपोर्ट मुताबिक, चीन ने इस मांग को ‘अनुचित’ बताया और तुरंत ठुकरा दिया. इसके पीछे का कारण यह नहीं था कि वह भारत के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाना चाहता था. बल्कि वह इंटरनेशनल नियमों में नहीं फंसना चाहता था. यह शर्त सीधे तौ पर परमाणु अप्रसार संधि (NPT) नियमों का उल्लंघन है. चीन NPT का सदस्य है और ऐसी तकनीक ट्रांसफर नहीं कर सकता. अगर चीन यह करता, तो उस पर भारी प्रतिबंध और कूटनीतिक दबाव पड़ सकता था. इसके अलावा चीन नहीं चाहता था कि भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु दौड़ और तेज हो

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