भारत में एक डॉलर की कीमत 96.35 रुपए तक पहुंच चुकी है। यह घट-बढ़ भी सकती है, लेकिन व्यापक परिवर्तन संभव नहीं हैं। यह भारतीय मुद्रा ‘रुपए’ का सबसे निचले स्तर का अवमूल्यन है। रुपए और डॉलर के इस समीकरण के बाद विश्व में सबसे कमजोर मुद्रा ‘रुपया’ ही है। यह बेहद चिंताजनक स्थिति है, बेशक भारत विश्व की एक बड़ी अर्थव्यवस्था है। नतीजा यह है कि हमने मार्च, 2026 में जो कच्चा तेल 1.17 लाख करोड़ रुपए में खरीदा था, वही अप्रैल में 1.79 लाख करोड़ रुपए में खरीदना पड़ा है। कच्चे तेल के अलावा, गैस, खाद, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, खाद्य तेल, दालें, सोना और अन्य आयातित वस्तुएं, सेवाएं हमें महंगी खरीदनी पड़ेंगी। अंतत: महंगाई बढ़ती जाएगी और आम आदमी कराहता रहेगा। सिर्फ एक ही बुनियादी कारण है-रुपए का अवमूल्यन। यह स्थिति मोदी सरकार के 12 सालों में लगातार खराब होती गई है। हालांकि 2023 में भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपए के कृत्रिम नियंत्रण की कोशिश की थी, लेकिन आज अवमूल्यन का यथार्थ सामने है। लिहाजा ‘मूडीज’ की ताजा रपट भी चर्चा में है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने निष्कर्ष दिया है कि भारत के जीडीपी की विकास दर 0.8 फीसदी कम हो गई है। वित्त वर्ष के अंत में विकास दर करीब 6 फीसदी ही रहने वाली है। सरकार 7-7.5 फीसदी की विकास दर का दावा करती रही है। रिजर्व बैंक ने भी 6.5 फीसदी तक का आकलन देना शुरू कर दिया है। एक आर्थिक वज्रपात यह भी हुआ है कि 2026 के पहले पांच महीनों में ही विदेशी निवेशकों ने 2.2 लाख करोड़ रुपए के शेयर बेच दिए हैं और भारतीय बाजार को अलविदा कह दिया है। हालांकि कुछ नई और छोटी कंपनियों में विदेशियों के निवेश अब भी मौजूद हैं, लेकिन वे अर्थव्यवस्था को अपेक्षित प्रभावित नहीं करते। ऐसे निवेशकों ने जापान, दक्षिण कोरिया और अमरीका की कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की कंपनियों में निवेश करना बेहतर समझा है। अप्रैल में 60,900 करोड़ रुपए और मई में अभी तक 1.22 लाख करोड़ रुपए विदेशी निवेशक हमारे बाजार से निकाल चुके हैं।
नतीजतन भारत को विदेशी मुद्रा का भी नुकसान झेलना पड़ेगा। जो आर्थिक उथल-पुथल हम देख रहे हैं, वह पूर्णत: ईरान युद्ध के नतीजतन नहीं है। युद्ध ने तेल, गैस, खाद समेत विश्व की बुनियादी सप्लाई चेन को तोड़ कर रख दिया है। इसी दौरान भारत-संयुक्त अरब अमीरात में समझौता हुआ है कि अरब देश हमारे यहां 5 अरब डॉलर का निवेश करेगा और 3 करोड़ बैरल कच्चे तेल का भंडारण तैयार करेगा, जिसका इस्तेमाल भारत भी आपातस्थिति में कर सकेगा। इसमें समय लगेगा, क्योंकि अभी खुद अरब देश ईरान के मिसाइल-ड्रोन हमले झेलने को विवश है। बहरहाल भारत के संदर्भ में ‘रुपए’ का अवमूल्यन बहुत बड़ा प्रभाव है, क्योंकि भारत 147 करोड़ से अधिक की आबादी और घोर आर्थिक, सामाजिक असमानताओं का देश है, लिहाजा यह तेल-गैस का ही नहीं, बल्कि आम भारतीय की आजीविका का भी ‘आपातकाल’ है। भारतीय अर्थव्यवस्था में चालू खाता घाटा वित्त वर्ष 2026-27 में जीडीपी के 2.3 फीसदी तक पहुंच सकता है, जबकि बीते 2025-26 में यह 0.9 फीसदी बताया जा रहा है। यह संकट प्रधानमंत्री मोदी की अपील, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के मेट्रो में सफर करने या ई-रिक्शा, विद्युत बस में दफ्तर जाने अथवा पैदल चलने और अंतत: बचत करने से ही दूर नहीं होगा। यदि ‘रुपए’ के अवमूल्यन से भारत चौथी अर्थव्यवस्था से फिसल कर छठी अर्थव्यवस्था पर आ सकता है, तो 7-8वां स्थान बहुत दूर नहीं है। फ्रांस जैसे विकसित देश की चुनौती सामने है। अर्थशास्त्रियों का सवाल है कि हम डॉलर में तेल क्यों खरीद रहे हैं? यदि सरकार के पास पैसा है, तो सबसिडी दे दें और तेल-गैस सस्ते में बेचें। बहरहाल यह भी विचार हो सकता है, लेकिन एक और आयाम सामने आया है। भारत में रेलवे, रक्षा, पोर्ट ट्रस्ट, सार्वजनिक उपक्रमों के पास 20-25 हजार वर्ग किलोमीटर जमीनें हैं। उन्हें आंशिक तौर पर बेचा या दीर्घकालिक लीज पर दिया जा सकता है। जमीन का यथोचित हिस्सा सुरक्षा और आपातस्थिति के लिए छोडऩे के बाद भी करीब 16-17 लाख करोड़ रुपए आ सकते हैं। इससे निजी निवेश भी आएगा और तेल आयात का मोटा खर्च भी निकलेगा। विदेशी मुद्रा सुरक्षित रहेगी, तो ‘रुपया’ भी सुधर सकता है। बहरहाल, भारतीय आर्थिकी को अभी लंबा रास्ता तय करना है। युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए भी सरकार को ठोस उपाय करने होंगे।



















