रायपुर। अपने हौसलों को यह मत बताओ कि, तुम्हारी परेशानी कितनी बड़ी है, बल्कि अपनी परेशानी को ये बताओ कि, तुम्हारा हौसला कितना बड़ा है । इन पंक्तियों को चरितार्थ किया है नन्हीं बहादुर नायक सोढ़ी भीमे ने। आकार आवासीय संस्था कुम्हाररस सुकमा में कक्षा पांचवी में अध्ययनरत सोढ़ी अस्थिबाधित दिव्यांग छात्रा है। वह अतिसंवेदनशील नक्सल प्रभावित क्षेत्र के पहाड़ी ढलानों पर स्थित अत्यंत पिछड़े दूरस्थ वनांचल गांव केसापारा गुफड़ी में निवास करती है। आत्मविश्वास से ओत-प्रोत सोढ़ी के पिता श्री मासा सोढ़ी ने हमारे नायक के राज्य ब्लॉग लेखक श्री गौतम शर्मा को बचपन में गठित दुर्घटना के संबंध में बताया कि जब वह 3 वर्ष की थी, तो ठंड के मौसम में घर के आंगन में आग तापने के दौरान खेलते-खेलते वो अचानक गिर पड़ी और उसका दाहिना पैर बुरी तरह से आग में झुलस गया। वो असहनीय दर्द से जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने लगी। यह देखकर घर वालों का दिल दहल गया कि अचानक क्या हो गया। कुछ देर पहले सोढ़ी हंसते खिल-खिलाते, उछल-कूद करते हुए खेल रही थी और कुछ ही देर में उसकी हसी चीख में कैसे बदल गई। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने और जागरूकता की कमी के कारण घर वालों ने उसका इलाज आसपास ही कराया। इस घटना के बाद सोढ़ी का जीवन पूरी तरह से बदल गया। तीन वर्ष की बच्ची एकदम चुप सी हो गई। न किसी से बात करना, न ही अच्छे से खाना-पीना और न ही किसी के साथ खेलना-कूदना। इस दर्दनाक घटना ने उसकी मुस्कुराहट ही छीन ली। सोढ़ी पर इस घटना का बहुत बुरा असर पड़ा। वो किसी से बात नहीं करती थी, बस घर के एक कमरे में चुपचाप बैठी रहती थी और उस भयानक दर्दनाक घटना के बारे में सोचकर उदास होकर रोने लगती थी। कहते हैं वक्त बड़े से बड़े जख्म को भर देता है वैसे ही धीरे-धीरे वक्त के साथ सोढ़ी के अंदर भी बदलाव आ गया और उसने अपनी कमजोरी को खुद पर हावी नहीं होने दिया। बहुत जल्द वह अपने एक पैर से चलना सीख गई। छह वर्ष की होने पर पिता ने गांव के सरकारी स्कूल शासकीय प्राथमिक शाला केशापारा गुफड़ी में उसका नाम दर्ज करवाया। घर से स्कूल का रास्ता उबड़-खाबड़ होने की वजह से उसे विद्यालय पहुंचने में दिक्कत हो रही थी। उसके अंदर पढ़ाई की ललक की वजह से वह प्रतिदिन विद्यालय जाती थी। जब सोढ़ी के बारे में सुकमा जिले में समावेशी शिक्षा के तहत संचालित आकार आवासीय संस्था को इसकी जानकारी मिली तो सोढ़ी के पिता से बात कर उसका दाखिला करवाया। शुरू-शुरू में सोढ़ी एकदम चुपचाप रहती थी, लेकिन धीरे-धीरे बच्चों के साथ घुल-मिल गई। अब वह सभी बच्चों के साथ-साथ पढ़ाई के साथ खेलती-कूदती भी है। कहते हैं कि एक सपने के टूटकर, चकनाचूर हो जाने के बाद, दूसरा सपना देखने के, हौसले को जिंदगी कहते हैं। वैसे ही सोढ़ी ने अपने जीवन का दूसरा सपना आकार आवासीय संस्था में दाखिले के बाद देखना शुरू किया। बहुत ही कम समय में इस संस्था में रहकर उसने बहुत कुछ सीख लिया और उसके अंदर एक नई ऊर्जा का संचार हुआ, जिसकी वजह से उसने अपनी सबसे बड़ी कमी को अपनी ताकत बनाया। वह एक सामान्य बच्चे की तरह एक पैर से ही सब कुछ करने लगी। सोढ़ी की नृत्य विधा में विशेष रूचि है, जिसे देखते हुए आकार आवासीय संस्था ने उसे नृत्य करने के लिए प्रेरित किया। कुछ ही दिनों में वह नृत्य विद्या में पारंगत हो गई और अब सामान्य बच्चों के साथ भी नृत्य करती है। सोढ़ी ने अपने साथ के एक मूकबधिर छात्र से प्रेरित होकर नृत्य करना शुरू किया। आज उसकी पहचान एक कुशल नृत्यांगना के रूप में हो गई है। पिछले वर्ष सोढ़ी ने सुकमा में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में नृत्य विधा में भाग लिया और काफी उम्दा प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में अधिकारियों और शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। सोढ़ी को एक पैर से इतना अच्छा प्रदर्शन करता देख तालियों की जो गडग़ड़ाहट हुई, उससे शहर गूंज उठा। सभी ने उसके हौसले और हिम्मत की जमकर प्रदर्शन की। सोढ़ी ने अपने हिम्मत और हौसले से यह साबित कर दिया कि किसी भी परिस्थिति में हार नहीं माननी चाहिए। डर मुझे भी लगा फासला देखकर, पर मैं बढ़ता गया रास्ता देखकर। खुद-ब-खुद मेरे नजदीक आती गई, मेरी मंजिल मेरा हौसला देखकर।

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