Hal Shashti 2026: आने वाले कल यानी 2 सितंबर 2026 को भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि पर हल षष्ठी मनाई जाएगी. ज्योतिषाचार्य संजीत कुमार मिश्रा बताते हैं कि यह दिन भगवान बलराम के जन्मोत्सव और माताओं के संतान कल्याण व्रत से जुड़ा है.

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मथुरा सहित देशभर के बलदेव मंदिरों में भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्मोत्सव श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. उन्हें शेषनाग का अवतार माना जाता है. बलराम का प्रमुख अस्त्र हल और मूसल है. इसी कारण उन्हें हलधर, हलघर और हलायुध जैसे नामों से जाना जाता है. उनके हल को केवल दुष्टों के विनाश का प्रतीक नहीं, बल्कि कृषि, सृजन और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है. इसी वजह से बलराम को कृषि का देवता भी कहा जाता है.

योगमाया ने देवकी के गर्भ को रोहिणी तक पहुंचाया

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने कंस के अत्याचार से पृथ्वी को मुक्त कराने के लिए श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेने का संकल्प लिया. उस समय योगमाया को विशेष दायित्व सौंपा गया. देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने अपनी दिव्य शक्ति से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया. इसी गर्भ-संकर्षण के कारण बलराम का एक नाम संकर्षण पड़ा.

बलराम को बलभद्र, बलदेव, दाऊ, रोहिणेय, अनंत और हलधर सहित कई नामों से जाना जाता है.

हल षष्ठी पर क्यों होती है हल की पूजा?

इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना से व्रत रखती हैं. हल, बैल और खेती से जुड़े उपकरणों की पूजा की जाती है और उनसे उस दिन कोई कृषि कार्य नहीं कराया जाता.

पर्व की परंपरा में हल से जोते गए अनाज जैसे गेहूं और चावल का सेवन नहीं किया जाता. दूध-दही के लिए भी गाय के बजाय भैंस या बकरी के दूध से बने पदार्थों के उपयोग की परंपरा बताई जाती है.

बलराम और रेवती का विवाह

बलराम का विवाह सतयुग के प्रतापी राजा रेवत की पुत्री रेवती से हुआ था. कथा के अनुसार रेवती के योग्य वर की तलाश में राजा रेवत उसे लेकर ब्रह्मलोक पहुंचे. वहां संगीत समारोह के कारण उन्हें कुछ समय प्रतीक्षा करनी पड़ी. इस दौरान पृथ्वी पर कई युग बीत गए.

ब्रह्मा ने लौटने पर बताया कि पृथ्वी पर अब रेवती के लिए बलराम ही योग्य वर हैं. इसके बाद बलराम और रेवती का विवाह हुआ. उन्हें रेवतीरमण भी कहा जाता है. मान्यता है कि राजा रेवत ने अपनी पुत्री के नाम पर रेवा वाड़ी नगर बसाया, जिसे आज रेवाड़ी के नाम से जाना जाता है.

महाभारत में भी महत्वपूर्ण भूमिका

बलराम के पुत्रों के नाम निशथ और उल्मुक तथा पुत्री वत्सला बताए जाते हैं. वत्सला का विवाह अभिमन्यु से होने की कथा भी मिलती है. बलराम ने भीम और दुर्योधन को गदा युद्ध की शिक्षा दी थी. उन्होंने प्रलंबासुर, धेनुकासुर, द्विविद और मुष्टिक जैसे असुरों का वध किया.

वैकुंठ धाम गए बलराम

महाभारत काल के अंत में गांधारी के शाप के कारण यादव कुल का विनाश हुआ. अपने कुल का अंत देखने के बाद बलराम गुजरात के प्रभास क्षेत्र में समुद्र तट पर एक विशाल वृक्ष के नीचे योग-समाधि में लीन हो गए. धार्मिक मान्यता के अनुसार इसके बाद उन्होंने देह त्यागकर भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ की ओर प्रस्थान किया.

हल षष्ठी इसलिए केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, कृषि, सृजन, मातृत्व और संतान के कल्याण से जुड़ी आस्था का पर्व भी माना जाता है.

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