पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नाम और घास-फूल वाले चुनाव चिह्न पर छिड़ा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. गुरुवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चुनाव आयोग से सीधा सवाल कर दिया कि आखिर फैसला करने में कितना समय लगेगा. कोर्ट ने आयोग से कहा कि वह सोमवार तक बताए कि इस विवाद का अंतिम फैसला कब तक किया जा सकता है. बात सिर्फ तारीख बताने की नहीं है. अदालत ने साफ संकेत दिया कि फैसला जल्द होना चाहिए. उपचुनाव की प्रक्रिया चल रही है. दोनों गुट खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं. ऐसे में पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज होने से मामला और उलझ गया है. इसी सुनवाई में शिवसेना विवाद का भी जिक्र आया. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने जब देरी की बात सुनी तो उन्होंने कहा कि हमने शिवसेना मामले में देरी का असर देखा है.
मामला पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी की याचिका से जुड़ा है. ममता गुट ने चुनाव आयोग के 17 सितंबर के अंतरिम आदेश को चुनौती दी है. आयोग ने घास-फूल वाला मूल नाम और चुनाव चिह्न फिलहाल फ्रीज कर दिया था. इसके बाद ममता गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और फुटबॉल खिलाड़ी वाला चिह्न दिया गया. वहीं ऋतब्रत बनर्जी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और लिफाफा चिह्न मिला. यह व्यवस्था पश्चिम बंगाल में होने वाले उपचुनावों के लिए की गई है. इन चुनावों में नंदीग्राम और रेजीनगर भी शामिल हैं. ममता गुट की ओर से कपिल सिब्बल ने जल्द अंतिम फैसला कराने की मांग रखी. अब अदालत ने आयोग से समयसीमा बताने को कहा है.
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्रि नायडू से पूछा कि अंतिम फैसला करने में आयोग को कितना समय चाहिए. उन्होंने कहा कि पक्षों को उचित मौका दिया जाना चाहिए. आयोग को मामले पर विचार करने का पर्याप्त समय भी मिलना चाहिए. लेकिन यह प्रक्रिया बहुत लंबी नहीं होनी चाहिए. कोर्ट की चिंता यह थी कि विवाद को जल्द सुलझाया जाए ताकि आगे की चुनावी प्रक्रिया पर इसका असर न पड़े.
दोनों गुटों के उम्मीदवारों ने किया है दावा
कोर्ट के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि उपचुनाव के लिए दोनों गुटों के उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है. दोनों ने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस से जुड़ा बताया है. इसी स्थिति को देखते हुए अदालत ने जल्द फैसला लेने की जरूरत पर जोर दिया. जस्टिस बागची ने कहा कि चुनाव कार्यक्रम पहले ही घोषित हो चुका है. ऐसे में इस चुनाव के लिए बनाई गई आयोग की अंतरिम व्यवस्था में फिलहाल दखल देना मुश्किल है.
कपिल सिब्बल ने उठाया देरी का सवाल
ममता बनर्जी की ओर से पेश कपिल सिब्बल ने कहा कि विवाद जुलाई में चुनाव आयोग के सामने पहुंच चुका था. इसके बावजूद मामला कई महीनों तक लंबित रहा. फिर उपचुनाव के बीच आयोग ने अंतरिम आदेश जारी कर दिया. सिब्बल का कहना था कि अगर फैसला पहले आता तो उनके पास अदालत जाने का रास्ता मौजूद रहता. उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के बीच ऐसा आदेश आने से उनके लिए प्रभावी कानूनी उपाय तलाशना मुश्किल हो गया है.
‘अस्तित्व का सवाल’ बता रहा ममता गुट
सुनवाई के दौरान ममता गुट की ओर से कहा गया कि पार्टी के मूल नाम और घास-फूल चिह्न का मामला उनके लिए अस्तित्व से जुड़ा है. सिब्बल ने कहा कि वे चुनाव रोकने की मांग नहीं कर रहे हैं. उनकी मांग यह है कि पार्टी के मूल नाम और चिह्न को लेकर उचित समाधान निकाला जाए. उन्होंने कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की. हालांकि अदालत ने संकेत दिया कि मौजूदा चुनाव प्रक्रिया के बीच अंतरिम व्यवस्था को बदलना आसान नहीं होगा.
कोर्ट ने बताया समाधान क्या है
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि इसका रास्ता यही है कि निर्वाचन आयोग इस विवाद पर जल्द फैसला करे. इसी के बाद कोर्ट ने आयोग से समयसीमा बताने को कहा. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पक्षों को अपनी बात रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए. यानी जल्दी का मतलब यह नहीं है कि प्रक्रिया को नजरअंदाज किया जाए. आयोग को सुनवाई और तथ्यों पर विचार के बाद फैसला करना होगा.
फिर क्यों आया शिवसेना विवाद का जिक्र?
मामले की सुनवाई में शिवसेना का जिक्र खास तौर पर ध्यान खींचने वाला रहा. ऋतब्रत बनर्जी गुट की ओर से पेश मुकुल रोहतगी ने कहा कि चुनाव आयोग पहले भी ऐसे विवादों में अंतरिम आदेश देता रहा है. उन्होंने शिवसेना विवाद का उदाहरण दिया. इसी पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि शिवसेना मामले में देरी का असर अदालत देख चुकी है. इसके साथ ही अदालत ने संकेत दिया कि मौजूदा विवाद को भी अनिश्चित समय तक लंबित रखना उचित नहीं होगा.
ऋतब्रत गुट ने मांगा ज्यादा समय
ऋतब्रत बनर्जी गुट की ओर से दलील दी गई कि अक्टूबर की समयसीमा बहुत कम होगी. मुकुल रोहतगी ने आयोग को कुछ और समय देने की मांग की. वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने कहा कि मामले में कई जटिल तथ्य हैं. इनके लिए हलफनामे और दूसरे सबूत पेश करने होंगे. उनके मुताबिक एक महीने का समय भी पर्याप्त नहीं हो सकता है. यानी एक तरफ जल्द फैसले की मांग है तो दूसरी तरफ पूरी प्रक्रिया के लिए पर्याप्त समय देने की दलील भी सामने आई है.
अभी किसके पास कौन सा नाम और चिह्न?
चुनाव आयोग के 17 सितंबर के अंतरिम आदेश के बाद ममता बनर्जी गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया गया है. इसके साथ फुटबॉल खिलाड़ी वाला चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है. ऋतब्रत बनर्जी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और लिफाफा चिह्न मिला है. यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों के लिए है. आयोग ने साफ किया है कि यह अंतिम फैसला नहीं है.



















