गयाजी: भगवान विष्णु की नगरी और मोक्षदायिनी भूमि गयाजी में चल रहे विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले के दौरान एक अद्भुत और अलौकिक आध्यात्मिक दृश्य देखने को मिला. सनातन परंपरा की महानता और इसकी वैश्विक स्वीकार्यता तब जगजाहिर हुई. जब सात समंदर पार से आईं विदेशी महिलाओं ने गयाजी के पवित्र वेदी स्थलों पर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए पूरे विधि-विधान से पिंडदान व तर्पण किया. जर्मनी, रूस, यूक्रेन और घाना जैसे देशों से आई इन महिला श्रद्धालुओं ने पारंपरिक भारतीय परिधान धारण कर, बिना किसी चूक के, पूर्ण नियम-निष्ठा के साथ पूजा-अर्चना की. सबसे खास बात यह रही कि पंडितों के उच्चारण के साथ इन सभी विदेशी महिलाओं ने धाराप्रवाह और स्पष्ट उच्चारण में संस्कृत के कठिन मंत्रों का पाठ किया. पिंडदान की संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान इनकी आस्था, अनुशासन और निष्ठा देखते ही बन रही थी.
देश-दुनिया से उमड़ रहा आस्था का जनसैलाब
गयाजी केवल भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. यहां देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु तो पहुंच ही रहे हैं, साथ ही अमेरिका, ब्रिटेन, नेपाल, रूस, जर्मनी और अफ्रीका जैसे देशों से भी लोग अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने खिंचे चले आ रहे हैं. कुछ ही दिनों पहले इस पावन भूमि पर देशभक्ति और आदर की एक भावुक मिसाल भी देखने को मिली थी.
जब जम्मू-कश्मीर में देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए 25 वर्षीय शहीद जवान के माता-पिता ने गयाजी पहुंचकर अपने बेटे की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया था. एक तरफ जहां सीमा पर सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सपूत के लिए तर्पण हुआ. वहीं दूसरी तरफ सात समंदर पार से आई विदेशी महिलाओं की यह साधना यह साबित करती है कि गयाजी की मोक्षभूमि जाति, देश और सीमाओं से परे हर आत्मा को शांति प्रदान करती है.
पितृपक्ष मेला: कब से कब तक?
वर्ष 2026 में विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले का आयोजन 26 सितंबर से शुरू हुआ है. यह 10 अक्टूबर 2026 (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलेगा. इस 15 दिवसीय महासंगम के दौरान लाखों श्रद्धालु अपने पितरों के उद्धार के लिए गयाजी पहुंचते हैं.
गयाजी में पिंडदान की धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्ता
धार्मिक मान्यताओं और वायु पुराण के अनुसार गयाजी को ‘पितृ तीर्थ’ का दर्जा प्राप्त है. स्वयं भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण ने भी अपने पिता महाराजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए फल्गु नदी के तट पर पिंड दान किया था. मान्यता है कि गयाजी में स्थित ‘विष्णु पद मंदिर’ में भगवान विष्णु के चरणों के दर्शन कर यहां फल्गु नदी के तट, अक्षयवट और प्रेतशिला जैसी पावन वेदियों पर पिंडदान करने से पितरों को सीधे प्रेतयोनि से मुक्ति मिलती है. वे बैकुंठ धाम को प्राप्त होते हैं.
सनातन धर्मशास्त्रों के अनुसार मनुष्य पर तीन मुख्य ऋण (देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण) होते हैं. गयाजी में पिंडदान और तर्पण करने से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है. जिन जातकों की कुंडली में पितृदोष होता है. उन्हें गयाजी में पिंडदान करने से विशेष लाभ मिलता है. परिवार में सुख, समृद्धि तथा शांति का वास होता है. विदेशी महिलाओं द्वारा संस्कृत मंत्रोच्चार के साथ किया गया यह तर्पण न केवल सनातन धर्म की विश्वव्यापी प्रासंगिकता को दर्शाता है. बल्कि यह भी संदेश देता है कि आत्मा की शांति और श्रद्धा की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती.



















