एयरपोर्ट के फूड कोर्ट में वेटर ने पूछा, ‘‘सर, क्या आप अपनी कॉफी के साथ कुछ और लेना चाहेंगे?’’ मैंने कहा, ‘‘हां, एक छोटा-सा लोन दे दीजिए।’’ वह मुस्कुरा दिया।मैंने समझाया, ‘‘मैंने पार्किंग के पैसे तो पहले ही भर दिए हैं। अगर मैं आपका सैंडविच भी खरीद लूं, तो शायद मेरे बच्चों की पढ़ाई ही छूट जाएगी।’’ एक समय था जब हम एयरपोर्ट पर हवाई जहाजों को उड़ान भरते देखने जाते थे। आजकल, हम अपनी बचत को भी उसी तरह ‘उड़ते’ हुए देखते हैं। और नहीं, जब मैं ‘मोनोपोली’ (एकाधिकार) की बात कर रहा हूं, तो मेरा मतलब बोर्ड गेम से नहीं है। कम से कम उस गेम में तो हर कोई कुछ पैसों के साथ शुरुआत करता है। जरा उन सुविधाओं पर नजर डालिए जो कभी सरकार चलाती थी और अब निजी हाथों में हैं। हमसे ‘दक्षता’ का वादा किया गया था। बहुत बढिय़ा! लेकिन क्या कोई समझा सकता है कि इस ‘दक्षता’ का मतलब मेरी जेब को पूरी तरह खाली कर देना क्यों है? ‘‘सर, ये प्रीमियम सुविधाएं हैं।’’ ‘‘मैंने तो बस अपनी कार पार्क की थी। क्या आपने उसे कोई मसाज दी है?’’
निजी कंपनियां बेशक सेवाओं में सुधार कर सकती हैं लेकिन किसी सार्वजनिक सुविधा को निजी हाथों में सौंप देने से अपने आप प्रतिस्पर्धा पैदा नहीं हो जाती। नीलामी के समय तो कई बोली लगाने वालों के पास विकल्प हो सकते हैं लेकिन एक बार कॉन्ट्रैक्ट मिल जाने के बाद, ग्राहक के पास क्या विकल्प बचता है? इसी बात से मुझे स्टारङ्क्षलक को लेकर हो रहे देशभक्तिपूर्ण विरोध की याद आती है। कुछ लोग इसे बाहर रखने की बात कर रहे हैं, उनका तर्क है कि कोई विदेशी कंपनी हमारे ‘घर’ (बाजार) में घुस रही है। सरकार का कहना है कि तीनों लाइसैंस प्राप्त सैटेलाइट ऑप्रेटरों का सुरक्षा मूल्यांकन किया जाएगा। यह ठीक है, नियमों को सख्ती से और सबके लिए समान रूप से लागू करें लेकिन देशभक्ति को किसी के बिजनैस साम्राज्य के बाहर तैनात ‘सिक्योरिटी गार्ड’ नहीं बन जाना चाहिए। ‘‘कौन आ रहा है?’’ ‘‘एक प्रतियोगी।’’ ‘‘देश के लिए खतरा!’’ ‘‘और ग्राहक का क्या?’’ ‘‘उसे तो बस गर्व महसूस करने का निर्देश दिया गया है।’’ मुझे कहीं ज्यादा गर्व होता अगर मेरा इंटरनैट तब भी काम करता, जब पूरा परिवार मेरे वाई-फाई से जुड़ जाता!
याद है, जब सड़कों पर एंबैसेडर और फिएट कारों का बोलबाला हुआ करता था? कार खरीदने के लिए पैसे और धैर्य के साथ-साथ, एक ऐसे मैकेनिक से अच्छे रिश्ते की भी जरूरत होती थी, जो कभी-कभी आपकी शादी से भी ज्यादा लंबे समय तक आपका साथ निभाता था! गाड़ी खडख़ड़ाती थी। दरवाजे खुलते समय आवाज करते थे। इंजन स्टार्ट होने से पहले मानो आपस में कोई मीटिंग करता था कि आज चालू होना है या नहीं। हम इसे ही देशभक्ति कहते थे, जबकि वह कार किसी रोडरोलर की तरह रेंगती हुई आगे बढ़ती थी। फिर और निर्माता आए तथा अचानक ग्राहकों को एक हैरान करने वाली बात पता चली। उनके पास चुनने का विकल्प था। निर्माताओं को बेहतर काम करना पड़ा, क्योंकि ग्राहक किसी दूसरे शोरूम में जा सकते थे। प्रतिस्पर्धा की यही खूबी है। यह कारोबारियों को यह याद रखने के लिए प्रेरित करती है कि ग्राहकों के पास चलने-फिरने के लिए पैर हैं।
अब, स्टारलिंक कोई ऐसी खैरात नहीं है जो आसमान से मुफ्त इंटरनैट लेकर उतरी हो। इसकी कीमतें भी ऐसी होनी चाहिएं, जिन्हें हम स्वीकार कर सकें। न तो कोई भारतीय अरबपति और न ही कोई अमरीकी अरबपति ऐसा है, जिसके प्रति हमें बिना सोचे-समझे समॢपत हो जाना चाहिए। उन्हें हमारे ग्राहकों के लिए आपस में मुकाबला करने दें। भारतीय कंपनियों को भारतीयों की बेहतर सेवा करके और मजबूत होने दें। और कृपया नागरिकों से यह कहना बंद करें कि वे राष्ट्रीय ध्वज लहराकर किसी कंपनी की बैलेंस शीट बचाएं। देशभक्ति का मतलब यह होना चाहिए कि हम अपने लोगों के लिए सबसे अच्छा चाहते हैं-सही कीमतें, भरोसेमंद सेवाएं और चुनने के लिए असली विकल्प।
किसी देश की महानता इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कुछ भारतीय कारोबारी कितनी चैन की नींद सोते हैं, जबकि लाखों लोग अपने बिलों की चिंता में डूबे रहते हैं। और कंपनियों को आने दें। प्रतिस्पर्धा होने दें। और जब कोई चिल्लाकर कहे, ‘‘इसे देश के लिए खरीदो!’’ तो विनम्रता से पूछें, ‘‘क्या इसका मुनाफा देश को मिलेगा, या सिर्फ किसी भारतीय अरबपति को?’’-दूर की कौड़ीराबर्ट क्लीमैंट्स



















