झाबुआ: झाबुआ और धार जिलों की खास पहचान ‘कड़कनाथ’ या ‘कालामासी’ अपनी अनूठी खूबियों के कारण हमेशा चर्चा में रहता है। जेट-ब्लैक पंखों, काले मांस और बेहतरीन चिकित्सीय व पोषण गुणों वाले इस मुर्गे को ग्लोबल लेवल पर पहुंचाने के लिए सरकार ने GI टैगिंग, सब्सिडी और ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट’ जैसे कई उपाय किए हैं। इसके बावजूद, यह विशेष नस्ल अपने मूल इलाकों में सिमटकर रह गई है और बाहर निकलकर उड़ान भरने के लिए संघर्ष कर रही है।
जब धोनी के एक ऑर्डर से चमकी थी किस्मत
कड़कनाथ को राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी हाइलाइट तब मिली जब साल 2022 में भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अपने रांची स्थित फार्म के लिए 2000 कड़कनाथ चूजों का ऑर्डर दिया था। इसके बाद झाबुआ की एक कोऑपरेटिव सोसाइटी ने इन चूजों की सप्लाई की थी, जिससे साफ हो गया था कि मध्य प्रदेश से बाहर भी इस नस्ल की जबरदस्त डिमांड है। हालांकि, इस एक बड़े हाइप और सेलिब्रिटी कनेक्शन के बाद भी व्यावसायिक स्तर पर इसका दायरा उस तरह नहीं फैल पाया जैसा अनुमान लगाया गया था।
प्रोडक्शन और सप्लाई चेन की क्या है स्थिति?
आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच झाबुआ स्थित कड़कनाथ पोल्ट्री ब्रीडिंग सेंटर ने लगभग 1.49 लाख चूजों का उत्पादन किया। इनमें से 1.12 लाख चूजे विभागीय सब्सिडी योजना के तहत करीब 2,800 लाभार्थियों तक पहुंचाए गए। इसके बावजूद, पशुपालन और डेयरी विभाग के अधिकारी भी यह स्वीकार करते हैं कि राज्य अभी तक इस नस्ल के लिए एक मजबूत सप्लाई और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क स्थापित नहीं कर पाया है।
क्यों आम आदमी की पहुंच से दूर है कड़कनाथ?
कड़कनाथ की सबसे बड़ी यूएसपी इसका शानदार न्यूट्रिशनल प्रोफाइल है। यह हाई प्रोटीन और लो फैट वाला होता है। लेकिन इसका एक पहलू इसकी कीमत भी है। बाजार में यह चिकन 800 रुपये प्रति किलो से अधिक कीमत पर बिकता है, जो पारंपरिक ब्रॉयलर या देसी चिकन की तुलना में काफी ज्यादा है। यही वजह है कि इसकी कीमत इसके मास-मार्केट अपील को सीमित कर देती है।
फरवरी 2022 में एक्सपायर हुआ रजिस्ट्रेशन
इसके अलावा, साल 2012 में आवेदन के बाद 2018 में मिला इसका GI रजिस्ट्रेशन फरवरी 2022 में एक्सपायर हो चुका है। हालांकि, राज्य सरकार इसे एक सामान्य प्रक्रिया बताते हुए रिन्यूअल की बात कह रही है। कृषि विज्ञान केंद्र झाबुआ के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आई.एस. तोमर का मानना है कि केवल उत्पादन बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि मध्य प्रदेश के बड़े शहरों में इसकी मार्केटिंग और एक मजबूत सप्लाई नेटवर्क तैयार करने की सख्त जरूरत है ताकि किसान सीधे उपभोक्ताओं और रिटेलर्स से जुड़ सकें।



















