नई दिल्ली। कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया. इस दौरान लोगों की मौत और दर्द से पूरी दुनिया कराह उठी. ऐसे में दुखों से पीडि़त दुनिया में करुणा का एक अहम स्थान हो जाता है. ऐसे में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने करुणा के भूमंडलीकर का नारा दिया और लोगों लोगों को इसे अपनाने की अपील की. सत्यार्थी की पुस्तक कोविड-19 सभ्यता का संकट और समाधान दुख-दर्द के दौरान करुणा की बात करती है. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में इस पुस्तक पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया था, जहां कई दिग्गज हस्तियों ने अपने विचार रखे. सत्यार्थी ने इस अवसर पर कहा, करुणा सकारात्मक, रचनात्मक सभ्यता के निर्माण का आधार है. करुणा में एक गतिशीलता है. एक साहस है और उसमें एक नेतृत्वकारी क्षमता भी है. करुणा एक ऐसी अग्नि है जो हमें बेहतर बनाती है. जब हम दूसरे को देखते हैं और उसके प्रति हमारे मन में एक जुड़ाव का भाव पैदा होता है, तो वह सहानुभूति है. जब हम महसूस करते हैं कि दूसरे का दुख, दर्द हमारी परेशानी है, तब वह संवेदनशीलता हो जाती है. लेकिन बिल्कुल अंदर का जो तत्व है वह है करुणा. यानी दूसरे के दुख-दर्द को अपना दुख-दर्द महसूस करके उसका निराकरण ठीक वैसे ही करें, जैसे हम अपने दुख-दर्द का करते हैं. महामारी से पीडि़त वर्तमान में दुनिया की जो स्थिति हो गई है, उससे निजात करुणा ही दिला सकती है. इसीलिए करुणा का वैश्वीकरण समय की जरूरत है. परिचर्चा की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष एवं सुप्रसिद्ध पत्रकार पद्मश्री रामबहादुर राय ने की. जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में जानीमानी सांस्कृतिक दार्शनिक और राज्यसभा की सांसद सोनल मानसिंह की मौजूदगी रही. स्वागत वक्तव्य लेखक, कलाविद एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी का रहा. अन्य वक्ताओं में सुप्रसिद्ध लेखक एवं पूर्व राजनयिक पवन के वर्मा, सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञ एवं राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी, सुप्रसिद्ध गीतकार एवं अध्यक्ष सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन प्रसून जोशी और मशहूर लेखक एवं नेहरू सेंटर, लंदन के निदेशक अमीश त्रिपाठी शामिल रहे.

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