लालकृष्ण आडवाणी 99 साल के हो गए. जनसंघ से BJP के उत्थान तक, उनकी राजनीतिक यात्रा, उपलब्धियों और विवादों को जानें.

लालकृष्ण आडवाणी आज यानी 8 नवंबर को 99 साल के हो गए और अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर गए. जनसंघ के रास्ते राजनीति में आए एलके आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी की नींव मजबूत की. 1990 की सोमनाथ से अयोध्या तक निकाली गई रथयात्रा ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया. BJP को दो लोकसभा सीटों से सत्ता तक पहुंचाने में उनकी अहम भूमिका रही, लेकिन प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना अधूरा रह गया. भारत रत्न से सम्मानित आडवाणी की राजनीतिक यात्रा उपलब्धियों, विवादों और कई बड़े बदलावों की कहानी है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक से लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, केंद्रीय गृह मंत्री और देश के उपप्रधानमंत्री तक का लालकृष्ण आडवाणी का सफर कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है.

8 नवंबर 1927 को अविभाजित भारत के कराची में जन्मे आडवाणी ने विभाजन का दौर देखा. 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद वे सिंध से दिल्ली आ गए. कराची से भारत आने से पहले 1942 में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ चुके थे. भारत आने के बाद उन्होंने संगठन के साथ काम जारी रखा और धीरे-धीरे राजनीति में अपनी जगह बनाई.

1957 में शुरू हुआ संसदीय राजनीति का सफर

आडवाणी ने 1957 में भारतीय जनसंघ के साथ सक्रिय राजनीति में कदम रखा. उस समय अटल बिहारी वाजपेयी समेत जनसंघ के नवनिर्वाचित सांसदों के संसदीय कामकाज में वे सहयोग करते थे. 1958 में उन्हें दिल्ली प्रदेश जनसंघ का सचिव बनाया गया.

पत्रकार आडवाणी, ऑर्गनाइजर में रहे सहायक संपादक

राजनीति के साथ आडवाणी ने पत्रकारिता में भी हाथ आजमाया. 1960 में वे अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिका ‘ऑर्गनाइजर’ में सहायक संपादक बने. हालांकि, 1967 में उन्होंने पत्रकारिता छोड़कर पूरी तरह राजनीति को अपना लिया.

1970 में वे पहली बार राज्यसभा पहुंचे. इसके बाद उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया. जनसंघ और फिर जनता पार्टी के दौर से गुजरते हुए आडवाणी उन नेताओं में शामिल हो गए, जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन में अहम भूमिका निभाई.

आडवाणी ने वाजपेयी के साथ BJP को दो सीटों से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचाया

1980 में BJP का गठन हुआ तो अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के पहले अध्यक्ष बने. उस समय पार्टी ने गांधीवादी समाजवाद का रास्ता अपनाया था. लेकिन 1984 के लोकसभा चुनाव में BJP को करारी हार मिली और पार्टी महज दो सीटों पर सिमट गई.

इस हार के बाद आडवाणी ने पार्टी की कमान संभाली. 1986 में वे BJP के अध्यक्ष बने. इसके बाद पार्टी की राजनीतिक दिशा में बड़ा बदलाव आया. BJP ने राम जन्मभूमि आंदोलन का समर्थन करना शुरू किया. जून 1989 में पालमपुर अधिवेशन में पार्टी ने औपचारिक रूप से राम मंदिर निर्माण की मांग का समर्थन किया.

आडवाणी ने इस मुद्दे को देशव्यापी राजनीतिक आंदोलन में बदलने की रणनीति बनाई. इसके लिए उन्होंने जनसंपर्क और यात्राओं का रास्ता चुना. इसी रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा बनी उनकी सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा.

25 सितंबर 1990: जब सोमनाथ से निकली राम रथयात्रा

25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ मंदिर से आडवाणी ने राम रथयात्रा शुरू की. इसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के समर्थन में देशभर में जनसमर्थन जुटाना था.

इस यात्रा के लिए एक टोयोटा वाहन को रथ जैसा रूप दिया गया था. आडवाणी इसी वाहन पर सवार होकर देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे. यात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए. धार्मिक नारों और सभाओं के जरिए राम जन्मभूमि आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में लाया गया.

इस यात्रा के गुजरात चरण के आयोजन में नरेंद्र मोदी ने भी भूमिका निभाई थी. उस समय वे गुजरात BJP में संगठनात्मक काम कर रहे थे.

रथयात्रा ने आडवाणी को राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख चेहरा बना दिया. हालांकि, इस यात्रा के साथ कई जगह सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाएं भी हुईं. इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों पर अलग-अलग नजरिये से चर्चा की है.

बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी, गिर गई VP सिंह सरकार

रथयात्रा के दौरान बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर 22 अक्टूबर 1990 की रात समस्तीपुर में आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद उन्हें अविभाजित बिहार और अब झारखंड के दुमका के एक गेस्ट हाउस में ले जाया गया.

BJP ने पहले ही साफ कर दिया था कि अगर आडवाणी को गिरफ्तार किया गया तो वह वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लेगी. गिरफ्तारी के बाद पार्टी ने अपना समर्थन वापस ले लिया और वीपी सिंह सरकार गिर गई.

इस घटनाक्रम ने आडवाणी को राष्ट्रीय राजनीति में और प्रभावशाली बना दिया. 1991 के लोकसभा चुनाव में BJP की सीटें बढ़कर 120 हो गईं. पार्टी कांग्रेस के बाद संसद में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. उत्तर प्रदेश में भी BJP ने सरकार बनाई.

बाबरी मस्जिद विध्वंस और राजनीति का विवादित अध्याय

आडवाणी की राजनीतिक यात्रा का सबसे विवादित अध्याय 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस रहा. उस दिन बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंचे थे और बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया. आडवाणी भी उस समय अयोध्या में मौजूद थे.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, आडवाणी ने बाद में इस घटना पर दुख जताया था. हालांकि, इस घटना के बाद देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा हुई और भारतीय राजनीति पर इसका गहरा असर पड़ा.

राम मंदिर आंदोलन और बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद BJP का राष्ट्रीय विस्तार तेज हुआ. 1990 के दशक में पार्टी ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की और अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार प्रधानमंत्री बने.

वाजपेयी के साथ जोड़ी, लेकिन PM बनने का सपना अधूरा

BJP के राजनीतिक विस्तार में आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी की जोड़ी की अहम भूमिका रही. दोनों नेताओं की राजनीतिक शैली अलग थी. वाजपेयी अपनी संवाद क्षमता और गठबंधन की राजनीति के लिए जाने जाते थे, जबकि आडवाणी संगठन को मजबूत करने और पार्टी के राजनीतिक आधार का विस्तार करने में सक्रिय रहे.

1998 में वाजपेयी के नेतृत्व में NDA सरकार बनी. आडवाणी ने इस सरकार में गृह मंत्री की जिम्मेदारी संभाली. बाद में 2002 से 2004 तक वे देश के उपप्रधानमंत्री भी रहे.

2004 के लोकसभा चुनाव में NDA की हार के बाद आडवाणी ने BJP के अध्यक्ष के रूप में पार्टी को संभाला. वे लंबे समय तक लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे.

हालांकि, प्रधानमंत्री बनने की उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकी. 2009 के लोकसभा चुनाव में वे BJP की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे, लेकिन पार्टी चुनाव नहीं जीत सकी.

2013 में नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए BJP की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद आडवाणी ने पार्टी के कई पदों से इस्तीफा दे दिया था. बाद में उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व की नई पीढ़ी के उभार के साथ उनकी भूमिका धीरे-धीरे सीमित होती गई.

जिन्ना पर बयान से लेकर हाशिये तक पहुंचने का दौर

आडवाणी के राजनीतिक जीवन में 2005 का पाकिस्तान दौरा भी एक बड़ा मोड़ साबित हुआ. इस दौरे के दौरान उन्होंने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता बताया था. उनके इस बयान से BJP और संघ परिवार में नाराजगी हुई. इसके बाद उन्हें BJP अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा.

इसके अलावा 1990 के दशक में सामने आए हवाला मामले में भी उनका नाम आया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पर्याप्त सबूत नहीं होने के कारण मामला समाप्त कर दिया था.

इन घटनाओं के बावजूद पार्टी के निर्माण और उसके राष्ट्रीय विस्तार में उनकी भूमिका बनी रही. 2014 के बाद BJP में नए नेतृत्व के उभार के साथ वे सक्रिय राजनीति से दूर होते चले गए.

2024 में मिला भारत रत्न

लंबे राजनीतिक जीवन के बाद 3 फरवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आडवाणी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किए जाने की घोषणा की. मार्च 2024 में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया.

यह सम्मान उनके दशकों लंबे सार्वजनिक जीवन और देश की राजनीति में योगदान के लिए दिया गया. प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें अपने राजनीतिक जीवन के महत्वपूर्ण मार्गदर्शकों में से एक बताया था.

लालकृष्ण आडवाणी का जीवन और राजनीतिक सफर

साल / तारीखजीवन की प्रमुख घटनाएं
8 नवंबर 1927वर्तमान पाकिस्तान के कराची में किशनचंद और ज्ञानदेवी आडवाणी के घर जन्म हुआ.
1936-1942कराची के सेंट पैट्रिक स्कूल में पढ़ाई की. मैट्रिक तक हर कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया.
1942राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से स्वयंसेवक के रूप में जुड़े.
1942भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हैदराबाद के दयाराम गिडुमल नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया.
1944कराची के मॉडल हाई स्कूल में शिक्षक के रूप में काम शुरू किया.
12 सितंबर 1947भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान प्रोपेलर विमान से सिंध छोड़कर दिल्ली पहुंचे.
1947-1951RSS सचिव के रूप में अलवर, भरतपुर, कोटा, बूंदी और झालावाड़ में संगठन का काम किया.
1957अटल बिहारी वाजपेयी की सहायता के लिए दिल्ली आए.
1958-1963दिल्ली प्रदेश जनसंघ के सचिव रहे.
1960-1967जनसंघ की राजनीतिक पत्रिका ‘ऑर्गनाइजर’ में सहायक संपादक के रूप में काम किया.
25 फरवरी 1965कमला आडवाणी से विवाह हुआ। उनके दो बच्चे प्रतिभा और जयंत हैं.
अप्रैल 1970पहली बार राज्यसभा के सदस्य बने.
दिसंबर 1972भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष चुने गए.
26 जून 1975आपातकाल के दौरान बेंगलुरु में गिरफ्तार किए गए और अन्य जनसंघ नेताओं के साथ बेंगलुरु सेंट्रल जेल भेजे गए.
मार्च 1977-जुलाई 1979केंद्र सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे.
1980-1986भारतीय जनता पार्टी (BJP) के महासचिव रहे.
मई 1986बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने.
3 मार्च 1988दोबारा बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए.
1990सोमनाथ से अयोध्या तक राम रथयात्रा शुरू की.
1997भारत की स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर स्वर्ण जयंती रथयात्रा शुरू की.
13 अक्टूबर 1999-13 मई 2004अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उप प्रधानमंत्री रहे.
-अरबिंद कुमार मिश्रा

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