उषा उत्थुप की भारी आवाज को कभी स्कूल के म्यूजिक टीचर ने कोरस के लायक नहीं माना था. नाइट क्लब से बॉलीवुड तक पहुंचे उनके सफर में 750 रुपये की पहली कमाई और 1983 का विवाद भी बेहद खास है.
कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनते ही पहचान लिया जाता है. उषा उत्थुप की आवाज भी ऐसी ही है. भारी आवाज, माथे पर बड़ी सी बिंदी, बालों में गजरा और कांजीवरम साड़ी… उनका यह अंदाज दशकों से लोगों के दिलों पर राज कर रहा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस आवाज के लिए आज उन्हें इतना प्यार मिलता है, उसी आवाज की वजह से कभी उन्हें स्कूल के म्यूजिक क्लास से बाहर कर दिया गया था?
उषा ने इस बात को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने न किसी दूसरी सिंगर की नकल की और न ही अपनी आवाज बदलने की कोशिश की. चेन्नई के एक नाइट क्लब से शुरू हुआ उनका सफर बॉलीवुड तक पहुंचा. पहली कमाई के 750 रुपये से लेकर पद्म भूषण तक, उनकी जिंदगी में कई ऐसे मोड़ आए, जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं हैं. यहां तक कि एक वक्त ऐसा भी आया, जब उनके गाने को ‘अपसंस्कृति’ बताकर उन्हें गाने से रोकने की कोशिश की गई.
जब म्यूजिक टीचर ने कहा- तुम्हारी आवाज कोरस के लायक नहीं
उषा उत्थुप का जन्म 8 नवंबर 1947 को मुंबई में हुआ था. वह एक पारंपरिक साउथ इंडियन परिवार से आती हैं. उनके घर में बचपन से ही अलग-अलग तरह का संगीत सुना जाता था. परिवार के इसी माहौल ने उनके अंदर गाने का शौक पैदा किया.
लेकिन स्कूल में उनका यह शौक एक बार मुश्किल में पड़ गया. उषा जब स्कूल के कोरस ग्रुप में गाना चाहती थीं, तब उनकी म्यूजिक टीचर मिस डेविडसन ने उन्हें ग्रुप से बाहर कर दिया. टीचर को लगता था कि उनकी भारी आवाज कोरस के साथ फिट नहीं बैठती. इसके बाद उन्हें गाने के बजाय ट्रायंगल और क्लैपर्स जैसे म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाने को दिए गए.
इस घटना को उषा ने कई इंटरव्यू में याद किया है. दिलचस्प बात यह है कि कई साल बाद वही टीचर उन्हें स्टेज पर गाते हुए देखने पहुंचीं. उस दिन दोनों भावुक हो गई थीं. जिस आवाज को कभी क्लास में जगह नहीं मिली, वही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी.
नाइट क्लब में गाने के लिए मिली थी 750 रुपये की पहली कमाई
उषा उत्थुप ने साल 1969 में चेन्नई के नाइट क्लब ‘नाइन जेम्स’ से अपने प्रोफेशनल सिंगिंग करियर की शुरुआत की. इस शुरुआत के पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा है. वह अपनी आंटी के साथ एक नाइट क्लब पहुंची थीं. वहां उन्हें गाने का मौका मिला और उनकी परफॉर्मेंस लोगों को पसंद आई. इसके बाद उन्हें वहां नियमित रूप से गाने का ऑफर मिला.
पहली बार गाने के बदले उन्हें 750 रुपये मिले थे. यह रकम उन्हें एक रात के लिए नहीं, बल्कि तीन हफ्ते की परफॉर्मेंस के लिए मिली थी. उषा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि पहली कमाई हाथ में आने पर वह बेहद खुश थीं. उन्होंने अपने लिए कुछ खरीदने के बजाय मां के लिए साड़ी और पिता के लिए मोजे खरीदे. बाद में वह नाइट क्लब की सबसे ज्यादा फीस पाने वाली सिंगर्स में शामिल हो गईं और उन्हें महीने के 1,500 रुपये मिलने लगे.
जब कांजीवरम साड़ी पहनकर पहुंचीं नाइट क्लब, लोगों ने उड़ाया मजाक
आज उषा उत्थुप की पहचान उनकी कांजीवरम साड़ी, बड़ी बिंदी और बालों में लगे गजरे से है. लेकिन यह अंदाज उस दौर में काफी अलग था. जब वह नाइट क्लब में गाने पहुंचीं, तब वहां दूसरी महिला सिंगर्स ज्यादातर वेस्टर्न कपड़ों में नजर आती थीं. ऐसे में साड़ी पहनकर पहुंचने वाली उषा को देखकर लोग हैरान रह जाते थे.
उन्होंने इंटरव्यू में बताया था कि शुरुआत में उनके कपड़ों को लेकर भी सवाल उठाए गए. उनसे कहा गया कि नाइट क्लब में गाने के लिए उन्हें बाकी सिंगर्स की तरह ग्लैमरस और वेस्टर्न लुक अपनाना चाहिए. लेकिन उषा ने अपनी पसंद नहीं बदली. वह साड़ी पहनकर ही स्टेज पर गाती रहीं.
धीरे-धीरे यही अंदाज उनकी पहचान बन गया. उन्होंने यह साबित किया कि स्टेज पर छाने के लिए किसी तय लुक या दूसरे की नकल करने की जरूरत नहीं होती.
देव आनंद और आरडी बर्मन ने पहचानी आवाज, ऐसे पहुंचीं बॉलीवुड
नाइट क्लब में उषा की परफॉर्मेंस की चर्चा धीरे-धीरे फिल्म इंडस्ट्री तक पहुंचने लगी. देव आनंद, विजय आनंद और आरडी बर्मन समेत कई बड़े फिल्मी लोगों ने उन्हें लाइव गाते हुए सुना था. इसके बाद उन्हें फिल्मों में गाने के मौके मिलने लगे.
उषा को पहला फिल्मी मौका शशि कपूर की फिल्म ‘बॉम्बे टॉकी’ (1970) में मिला. इसके बाद उन्होंने ‘कभी धूप कभी छांव’ और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ जैसी फिल्मों में गाने गाए. ‘वन टू चा चा चा’, ‘हरी ओम हरी’, ‘रंबा हो हो हो’ और ‘कोई यहां नाचे नाचे’ जैसे गानों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ा दिया.
उनकी आवाज में एक अलग तरह की ऊर्जा थी. यही वजह थी कि वह रोमांटिक गानों से लेकर डांस नंबर तक में अपनी अलग छाप छोड़ने में कामयाब रहीं.
जब उषा उत्थुप के गानों को बताया गया ‘अपसंस्कृति’, नेता ने की थी रोक लगाने की कोशिश
उषा उत्थुप की जिंदगी का एक ऐसा किस्सा भी है, जो कम लोगों को पता है. साल 1983 में पश्चिम बंगाल में उनके गानों और डिस्को परफॉर्मेंस को लेकर विवाद खड़ा हो गया था. उस समय राज्य के एक मंत्री जतीन चक्रवर्ती ने उनके गानों को ‘अपसंस्कृति’ बताया था. उनका कहना था कि इस तरह के गाने और परफॉर्मेंस खराब सांस्कृतिक असर डालते हैं.
यह मामला तब बढ़ा, जब उषा कोलकाता के महाजाति सदन में परफॉर्म करने वाली थीं. मंत्री के बयान के बाद उनके कार्यक्रम को लेकर विवाद हुआ. उषा ने इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कोर्ट के सामने उन्होंने कहा कि उनके गानों और परफॉर्मेंस पर इस तरह की टिप्पणी गलत है.
इस विवाद ने उस दौर में काफी सुर्खियां बटोरी थीं. बाद में उषा ने ‘Poor Cultural Taste’ इंटरव्यू में बताया कि उन्हें यह सोचकर हैरानी हुई थी कि एक आम इंसान और सिंगर को आखिर गाने से रोकने की कोशिश क्यों की जा रही है. जिस सिंगर की आवाज और अंदाज ने लोगों को अपना दीवाना बनाया, उसे कभी अपने गानों के लिए ही विरोध झेलना पड़ा था.
नाइट क्लब में हुई मुलाकात, जानी चाको को दे बैठीं दिल
उषा उत्थुप की लव स्टोरी भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. उनकी मुलाकात जानी चाको उत्थुप से कोलकाता के मशहूर नाइट क्लब ट्रिनकास में हुई थी. उस वक्त उषा वहां गाने के लिए जाती थीं, जबकि जानी चाय के कारोबार से जुड़े थे. दोनों की मुलाकात दोस्ती में बदली और फिर उन्होंने शादी कर ली.
दोनों ने अपनी जिंदगी के 50 साल से ज्यादा साथ बिताए. उनके दो बच्चे हैं, बेटी अंजलि और बेटा सनी. हालांकि, जुलाई 2024 में जानी चाको का निधन हो गया. इस घटना ने उषा को गहरे दुख में डाल दिया था.
17 भारतीय और 8 विदेशी भाषाओं में गाए गाने
उषा उत्थुप की खासियत सिर्फ उनकी भारी आवाज नहीं है. वह कई भाषाओं में गाने के लिए भी जानी जाती हैं. भारत सरकार के पद्म भूषण सम्मान पत्र के मुताबिक, उन्होंने 17 भारतीय और 8 विदेशी भाषाओं में गाने रिकॉर्ड किए हैं. वह 100 से ज्यादा एल्बम का हिस्सा रही हैं.
उनकी आवाज ने हिंदी के अलावा बंगाली, तमिल, मलयालम और कई दूसरी भाषाओं के श्रोताओं को भी अपना दीवाना बनाया. यही वजह है कि उनकी पहचान सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं रही.
पद्मश्री से पद्म भूषण तक, ऐसे मिला मेहनत का सम्मान
संगीत की दुनिया में उनके योगदान के लिए उषा उत्थुप को साल 2011 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. इसके बाद साल 2024 में उन्हें पद्म भूषण मिला. फिल्म ‘7 खून माफ’ के गाने ‘डार्लिंग’ के लिए उन्हें साल 2011 में बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला.
आज उषा उत्थुप सिर्फ एक सिंगर नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान बनाने की मिसाल हैं. जिस आवाज को कभी स्कूल के कोरस में जगह नहीं मिली, उसी आवाज ने उन्हें देश-दुनिया में पहचान दिलाई. उन्होंने यह दिखाया कि अगर आपके अंदर हुनर है, तो जरूरी नहीं कि आप दुनिया के बनाए रास्ते पर ही चलें. कई बार अपनी अलग राह बनाना ही सबसे बड़ी कामयाबी होती है.



















