करीब डेढ़ वर्ष से अराजकता और राजनीतिक अस्थिरता के गर्त में फंसे बांग्लादेश का भीड़ तंत्र अब समाप्त हो गया है। बांग्लादेश में हुए आम चुनावों के परिणामों ने देश को एक बार फिर लोकतंत्र के पथ पर अग्रसर होने का जनादेश दिया है। बांग्लादेश में ‘जेन-जी’ द्वारा शेख हसीना की अवामी लीग सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद से, जिसने धांधली और चुनावी धोखाधड़ी के माध्यम से सत्ता हथिया ली थी, मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार कार्यरत थी। हालांकि, यूनुस की अंतरिम सरकार के प्रति तीव्र असंतोष के कारण बांग्लादेश की जनता जुलाई २०२४ से लगातार १८ महीनों तक सड़कों पर उतरी रही। इसी पृष्ठभूमि में तारिक रहमान के नेतृत्ववाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने बांग्लादेश में हुए आम चुनावों में शानदार जीत हासिल की। ​​गुरुवार को हुए चुनावों में बीएनपी ने २९९ में से २०९ सीटें जीतकर पार्टी अध्यक्ष तारिक रहमान को दो-तिहाई बहुमत के साथ बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजदूत के रूप में शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित थे और यह उचित ही था कि मोदी ने नए प्रधानमंत्री को भारत आने का निमंत्रण दिया। तारिक रहमान पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया और पूर्व राष्ट्रपति जिया-उर रहमान के पुत्र हैं। वे पिछले १७ वर्षों से लंदन में राजनीतिक निर्वासन में थे। वे महज दो महीने पहले बांग्लादेश लौटे और भारी बहुमत से देश के नए प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री रहमान के साथ-साथ २५ मंत्रिमंडल सदस्यों और २४ राज्य मंत्रियों का भी शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया गया। मंत्रिमंडल में अधिकांश
चेहरे नवीन
हैं। प्रधानमंत्री रहमान द्वारा हिंदू निताई रॉय चौधरी और बौद्ध दीपेन दीवान को मंत्रिमंडल में शामिल करके बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों का दिल जीतने के प्रयास सराहनीय हैं। बांग्लादेश की ९१ प्रतिशत मुस्लिम आबादी में से लगभग ८ प्रतिशत हिंदू हैं। शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगने के कारण इस बार पहली बार, अधिकांश हिंदू मतदाताओं ने बीएनपी का रुख किया है। हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में भड़की हिंसा में हिंदुओं को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया था। लोकतांत्रिक तरीकों से सत्ता में आई तारिक रहमान की नई सरकार को न केवल हिंदुओं को कट्टरपंथियों से बचाना चाहिए, बल्कि उनका विश्वास भी जीतना चाहिए। हिंसक प्रदर्शनकारियों द्वारा सत्ता से बेदखल किए जाने के बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा और तब से उन्होंने भारत में शरण ली है। हालांकि, हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद आंदोलन और विरोध प्रदर्शन के नेता भटक गए। कानून का शासन हिंसा और भीड़ हिंसा में तब्दील हो गया। बांग्लादेश की सड़कों पर आगजनी, पत्थरबाजी और हिंसक घटनाओं का एक खूनी खेल शुरू हो गया। इन गिरोहों का नारा ‘हम करें सो कायदा’ बन गया और देखते ही देखते पूरे देश में इसके खिलाफ आक्रोश पैâल गया। यही कारण है कि बांग्लादेश के आम चुनावों में कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी और राष्ट्रवादी सिटिजन्स पार्टी, जिसने शेख हसीना की सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभाई थी को
बड़ी पराजय का
मुंह देखना पड़ा। भारत के दृष्टिकोण से इन दोनों दलों की हार को महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। हालांकि, इसके बावजूद कट्टरपंथी दल से बड़ी संख्या में उम्मीदवारों का चुना जाना एक चेतावनी का संकेत है। मोहम्मद यूनुस की सरकार पर कट्टरपंथी प्रभाव मजबूत था और यही कारण था कि मोहम्मद यूनुस भारत को शत्रु मानकर पाकिस्तान और चीन के साथ संबंध बढ़ाने की कोशिश करते रहे। नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह से पहले दिए गए यूनुस के विदाई भाषण में भी हिंदुस्थान के प्रति उनकी घृणा और चीन के प्रति उनका प्रेम स्पष्ट रूप से झलका। यूनुस ने भड़काऊ दावा किया था कि बांग्लादेश ही उत्तर-पूर्वी भारत में बांग्लादेश से सटे इलाकों के सात राज्यों का यानी ‘सेवन सिस्टर्स’ का मुख्य संरक्षक है। यूनुस ने इन सात राज्यों, नेपाल और भूटान के साथ एक स्वतंत्र आर्थिक गुट बनाने का भारत-विरोधी रुख अपनाया था। हसीना सरकार के पतन और मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में पैâली अराजकता के खात्मे के बाद बांग्लादेश में एक बार फिर लोकतंत्र का नया सवेरा हुआ है। नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सामने बांग्लादेश की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ देश में कानून का शासन स्थापित करने की बड़ी चुनौती है। पिछले डेढ़ वर्षों में यूनुस सरकार के दौरान बांग्लादेश की पाकिस्तान और चीन से निकटता काफी बढ़ गई थी। बांग्लादेश को पाकिस्तान और चीन के चंगुल से निकालने के लिए हमारे शासकों को कूटनीति में भी निपुण होना होगा। बांग्लादेश के नए शासकों को यह समझना चाहिए कि भारत ने ही बांग्लादेश को पाकिस्तान की क्रूरता और पाकिस्तानी सैनिकों के अत्याचारों से स्थायी रूप से मुक्त कराया था। उपकार का बदला अपकार से न हो!

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