द्वितीय विश्व युद्ध की भयावह तबाही के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि दुनिया को भविष्य के युद्धों से बचाया जा सके और वैश्विक शांति, सहयोग तथा कूटनीति को मजबूत बनाया जा सके. उस समय यह संस्था मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उम्मीद के रूप में उभरी थी. लेकिन आज की वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए यह प्रश्न तेजी से उठ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी प्रभावशीलता और प्रासंगिकता खोता जा रहा है ?

पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं पर नजर डालें तो यह चिंता निराधार नहीं लगती. रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध अब चौथे वर्ष में प्रवेश करने वाला है. यूरोप की धरती पर चल रहा यह संघर्ष हजारों लोगों की जान ले चुका है और लाखों लोगों को विस्थापित कर चुका है. इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र इस युद्ध को रोकने में प्रभावी भूमिका निभाने में असफल दिखाई देता है. इसी प्रकार पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव भी विश्व शांति के लिए गंभीर खतरा बन गया है. गाजा से लेकर खाड़ी क्षेत्र तक अस्थिरता का माहौल है. ईरान और इजरायल के बीच सीधे सैन्य टकराव ने तीसरे विश्व युद्ध की आशंका तक पैदा कर दी है. संयुक्त राष्ट्र इस पूरे संकट में केवल अपील और चिंता जताने तक सीमित दिखाई देता है.

एशिया में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है. चीन लगातार ताइवान को अपने नियंत्रण में लेने की धमकी दे रहा है. दक्षिण चीन सागर में उसकी आक्रामक गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय कानूनों को चुनौती देती रही हैं. वहीं पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर भी समय-समय पर तनाव और झड़पें होती रहती हैं. इन तमाम घटनाओं के बीच संयुक्त राष्ट्र की भूमिका एक प्रभावी मध्यस्थ के बजाय एक औपचारिक मंच जैसी दिखाई देती है.

इस स्थिति के पीछे संयुक्त राष्ट्र की संरचनात्मक कमजोरियां भी जिम्मेदार हैं. सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा परिषद की बनावट को लेकर उठता है. पांच स्थायी सदस्यों,अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस,को मिली वीटो शक्ति अक्सर वैश्विक निर्णय प्रक्रिया को बंधक बना देती है. जब इन शक्तिशाली देशों के हित टकराते हैं, तो संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव और निर्णय कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं.

दूसरी बड़ी कमजोरी यह है कि संयुक्त राष्ट्र के पास अपने निर्णयों को लागू कराने के लिए कोई स्वतंत्र सैन्य शक्ति नहीं है. शांति मिशनों के लिए भी उसे सदस्य देशों की सेनाओं पर निर्भर रहना पड़ता है. यही कारण है कि कई बार उसके प्रस्तावों और अपीलों को संबंधित देश नजरअंदाज कर देते हैं.बहरहाल,संयुक्त राष्ट्र को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी है, तो उसे गंभीर सुधारों की दिशा में कदम उठाने होंगे. सुरक्षा परिषद का विस्तार, उभरती शक्तियों को प्रतिनिधित्व, और वीटो शक्ति की समीक्षा जैसे कदम अब समय की मांग बन चुके हैं. भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील जैसे देशों की भागीदारी से ही यह संस्था वास्तव में अधिक लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक बन सकती है. कुल मिलाकर दुनिया आज फिर एक अस्थिर दौर से गुजर रही है. ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. यदि यह संस्था शक्तिशाली देशों के हितों से ऊपर उठकर मानवता के हित में निर्णायक कदम उठाने में सफल होती है, तो ही वह अपनी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता को बनाए रख पाएगी. अन्यथा इतिहास यह याद रखेगा कि जब दुनिया को सबसे ज्यादा एक मजबूत वैश्विक संस्था की जरूरत थी, तब वह निर्णायक भूमिका निभाने में असफल रही.

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