चेन्नई/कोयंबटूर: दक्षिण राज्य तमिलनाडु के विधनासभा चुनावों में मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ डीएमके और एआईएडीएमके की अगुवाई वाले एनडीए के बीच होने की उम्मीद है। कुछ सीटों पर एक्टर विजय की अगुवाई वाली टीवीके मुकाबले को त्रिकोणीय कर सकती है। ऐसे में जब तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन प्रक्रिया जारी है तब दक्षिण के मैनचेस्टर कहे जाने वाले काेयंबटूर से बड़ा अपडेट सामने आया है। 1952 के बाद तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका है जब कोयंबटूर जिले में विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों का कोई उम्मीदवार उतारा है। आजादी के बाद से अब तक कोयंबटूर में वामदलों ने अपनी उपस्थिति रखी है लेकिन इन चुनावों में वोटिंग से पहले उनका सफाया हो गया है। कोयंबूटर जिले में विधानसभा की 10 सीटें हैं।


क्यों घट गई वामदलों की ताकत?

कोयबंटूर में यह अनुपस्थिति 2026 के चुनावों से पहले जिले के राजनीतिक स्वरूप में एक बड़ा बदलाव दर्शाती है। इस घटनाक्रम को राज्य में बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और विकसित होते राजनीतिक समीकरणों के प्रतिबिंब के रूप में देखा जा रहा है। कभी कम्युनिस्ट पार्टियों का स्वाभाविक गढ़ माने जाने वाले कोयंबटूर में सालों से वामपंथी प्रभाव, विशेषकर संगठित श्रमिक आंदोलनों को बनाए रखने वाले घटक में लगातार गिरावट देखी गई है। इस परिवर्तन के केंद्र में कपड़ा क्षेत्र का पतन है, जो कभी कोयंबटूर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ था। कोविड-19 महामारी के बाद से राष्ट्रीय वस्त्र निगम (एनटीसी) सहित प्रमुख मिलों के बंद होने से उन ट्रेड यूनियनों को कमजोर कर दिया गया है जो पारंपरिक रूप से इस क्षेत्र में वामपंथी दलों का समर्थन करती थीं।

श्रमिकों की संख्या घटने से पड़ा असर

औद्योगिक श्रमिकों और श्रमिक संघों के नेटवर्क की घटती उपस्थिति के साथ सीपीआई और सीपीआई (एम) जैसी पार्टियों की चुनावी ताकत धीरे-धीरे कम होती जा रही है, जिससे जिले में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने और सीटें जीतने की उनकी क्षमता घट रही है। सीपीआई के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि श्रमिक संघों की घटती ताकत का वामपंथी पार्टियों की चुनावी संभावनाओं पर सीधा असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि 1952 के पहले विधानसभा चुनावों से ही वामपंथी पार्टियां कोयंबटूर में लगातार स्वतंत्र रूप से या गठबंधन के हिस्से के रूप में चुनाव लड़ती रही हैं और प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल करती रही हैं। श्रमिक संघों के कमजोर होने से यह स्थिति बदल गई है।

सीपीआई (एम) को मिली थी सफलता

ऐतिहासिक रूप से सीपीआई (एम) को कोयंबटूर पूर्व जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता मिली है, जहां उसने पांच सीटें जीतीं, जबकि पेरूर और सिंगनल्लूर में उसे दो-दो सीटें मिलीं। दूसरी ओर सीपीआई ने 1980 और 2011 में वालपराई विधानसभा सीट जीती थी। संसदीय स्तर पर सीपीआई ने कोयंबटूर लोकसभा क्षेत्र में पांच बार जीत हासिल की, जबकि सीपीआई (एम) ने इसे तीन बार जीता। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 में वामपंथी उम्मीदवारों की अनुपस्थिति का मुख्य कारण डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन में सीटों के बंटवारे की व्यवस्था है।

वामदलों को नहीं मिली सीटें

सीपीआई और सीपीआई (एम) दोनों ने वालपराई और सिंगनल्लूर जैसी सीटों पर चुनाव लड़ने की कोशिश की थी, लेकिन अंततः उन्हें सीटें नहीं मिलीं। जिले में सीधे चुनाव न लड़ने के बावजूद, वामपंथी दलों ने अपना ध्यान डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन की संभावनाओं को मजबूत करने पर केंद्रित कर लिया है। नेताओं ने संकेत दिया है कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं को संगठित करने और जमीनी स्तर पर प्रचार कार्य पहले से ही चल रहा है। 2021 के विधानसभा चुनावों में वामदलों ने DMK के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, जहां CPI और CPI(M) दोनों को 2-2 सीटें मिली थीं।

Advertisement Carousel
Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
April 2026
M T W T F S S
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
27282930