अहमदाबाद : मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट के चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर ने गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। उन्होंने ‘लैंड एक्विजिशन, रिहैबिलिटेशन एंड रीसेटलमेंट अथॉरिटी’ (LARRA) द्वारा जमीन के मुआवजे में बढ़ोतरी के आदेश के बाद 1.1 लाख करोड़ रुपये के बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की लागत में भारी बढ़ोतरी की आशंका जताई है। एडवोकेट जनरल कमल त्रिवेदी ने हाई कोर्ट को बताया कि बुलेट ट्रेन अथॉरिटी का अनुमान है कि LARRA द्वारा जनवरी और फरवरी में जारी किए गए ज्यादा मुआवज़े के आदेशों से 40,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है, जिससे प्रोजेक्ट के जारी रहने पर खतरा पैदा हो सकता है। कोर्ट ने सूरत और भरूच जिलों से LARRA के आदेशों को चुनौती देने वाली तीन अपीलें स्वीकार कर ली हैं।

ये मामले भरूच जिले के अमोद तालुका के ओछन गांव में जमीन के टुकड़ों से जुड़े हैं। इन्हें ‘राइट टू फेयर कंपनसेशन एंड ट्रांसपेरेंसी इन लैंड एक्विजिशन, रिहैबिलिटेशन एंड रीसेटलमेंट एक्ट’ के तहत 2018 की अधिसूचना के बाद अधिग्रहित किया गया था।

2020 में तय हुआ था मुआवजा

2020 में, अधिग्रहण अथॉरिटी ने बाजार भाव के आधार पर मुआवज़ा 50 रुपये प्रति वर्ग मीटर तय किया था, जिससे एक मामले में मुआवज़ा 85.86 लाख रुपये बना था। ज़मीन मालिक ने मुआवज़ा बढ़ाने की मांग की, जिसके बाद LARRA ने उसी जमीन के टुकड़े के लिए 660 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से 8.46 करोड़ रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया।

वकील ने गुजरात हाई कोर्ट को क्या बताया

मुआवजे में लगभग दस गुना बढ़ोतरी को चुनौती देते हुए, एडवोकेट जनरल ने हाई कोर्ट को बताया कि LARRA ने ओछन के पास के गांवों में जमीन की बिक्री के उदाहरणों को नजरअंदाज किया और इसके बजाय 14 किमी दूर स्थित सिमर्था गांव के आंकड़ों पर भरोसा किया। उन्होंने कहा कि LARRA ने सिमर्था की 450 रुपये प्रति वर्ग मीटर की ‘जंत्री’ कीमत और वडोदरा-मुंबई एक्सप्रेसवे से जुड़े 2013 के जमीन अधिग्रहण के मामले का इस्तेमाल किया, और फिर चार साल आठ महीने के लिए 10% सालाना बढ़ोतरी लागू करके 660 रुपये प्रति वर्ग मीटर की कीमत तय की।

अपील में क्या दावा

अपनी अपील में, प्रोजेक्ट अथॉरिटी ने तर्क दिया कि मुआवजा सबसे पास के गांव में वैसी ही जमीन की औसत बिक्री कीमत के आधार पर तय किया जाना चाहिए। हालांकि, LARRA ने उस अवार्ड पर विचार करने में गंभीर गलती की है, जिसमें सिमार्थ गांव की जंत्री वैल्यू का ज़िक्र है। यह गांव मौजूदा कार्यवाही में अधिग्रहित की जा रही जमीन से 14 किमी दूर है। इसे आधार नहीं बनाया जा सकता था क्योंकि सेक्शन 26(1)(b) के तहत आस-पास की वैसी ही ज़मीनों के 2015 से 2017 के बीच हुए बिक्री-पत्र (सेल डीड) उपलब्ध थे। इसमें आगे कहा गया है कि इसके अलावा, LARRA ने एक अलग गांव यानी सिमार्थ के पहले के अवार्ड पर भरोसा करके भी गलती की है, क्योंकि एक्ट के सेक्शन 26(1) के स्पष्टीकरण 3 (Explanation 3) के तहत ऐसा करना मान्य नहीं है।

जस्टिस इलेश वोरा और जस्टिस आर टी वछानी की बेंच ने तीनों अपीलों को स्वीकार कर लिया, नोटिस जारी किए और मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त के लिए तय की। उस दिन हाई कोर्ट इस बात पर विचार कर सकता है कि LARRA के आदेश पर रोक लगाई जाए या नहीं। कोर्ट ने प्रोजेक्ट अथॉरिटी से यह भी पूछा कि वे अवार्ड की कितनी रकम जमा करना चाहते हैं, इस पर एक उचित प्रस्ताव दें।

त्रिवेदी ने कोर्ट को बताया कि 85 अपील पाइपलाइन में हैं, क्योंकि मध्य और दक्षिण गुजरात में जमीन के कई टुकड़ों के लिए मुआवजा बढ़ाने के आदेश जारी किए गए थे। ब्याज सहित, मुआवज़े की रकम लगभग 40,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि अगर हम पर यह खास बोझ डाला गया, तो हमें बुलेट ट्रेन नहीं मिल पाएगी। मैं बहुत बड़ी बात कह रहा हूं।

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