महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव में भाजपा को अभूतपूर्व और प्रचंड जनादेश मिला है। एक तरफ बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में पुरानी शिवसेना का वर्चस्व और शासन समाप्त किया है, तो दूसरी तरफ पुणे में शरद पवार के परंपरागत गढ़ को ध्वस्त किया है। पवार अब न तो ‘चाणक्य’ रहे हैं और न ही राजनीतिक तौर पर प्रासंगिक रहे हैं। उनका राजनीतिक युग समाप्त हो चुका है। महाराष्ट्र नगर निगम के कुल 2869 में से 1440 वार्ड में भाजपा के पार्षद विजयी रहे हैं, लिहाजा कुल 29 नगर निगमों में से 25 में भाजपा के मेयर सत्तारूढ़ हो सकते हैं। भाजपा ने भी ऐसे जनादेश की कल्पना नहीं की थी। महत्वपूर्ण यह रहा कि ये चुनाव प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के बड़े नेताओं के प्रचार के बिना ही लड़े गए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ही चौतरफा नेतृत्व किया और परिणाम सामने है। जाहिर है कि फडणवीस का भाजपा के भीतर राजनीतिक कद बढ़ेगा। बहरहाल जनादेश की दृष्टि से शिवसेना (उद्धव ठाकरे) और कांग्रेस भाजपा से कई गुना पीछे रह गई हैं। सबसे शानदार और उल्लेखनीय जीत बीएमसी की रही है, लिहाजा अब देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में भाजपा का मेयर (महापौर) होना चाहिए। लेकिन अकेली भाजपा के 89 पार्षदों के बावजूद बीएमसी में बहुमत नहीं है। भाजपा-शिवसेना (शिंदे) ने ‘महायुति’ वाले गठबंधन के तहत ही चुनाव लड़ा था। शिवसेना के 29 पार्षद जीते हैं। साझा गठबंधन को सदन में 118 पार्षदों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल है। सत्ता से बाहर हो रही शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की ‘मनसे’ ने 20 साल बाद गठबंधन में चुनाव लड़ा था। उन्हें 71 पार्षद मिले हैं। मराठी मानुष, मराठा, मराठी भाषा के प्रचार को जनता ने खारिज कर दिया।

अब मराठा सियासत के कई साझेदार हो गए हैं, जिनमें भाजपा और शिंदे सेना भी शामिल है। बेशक ठाकरे घराने की चुनावी पराजय हुई है, लेकिन पार्टी संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की विरासत अब भी अस्तित्व में है। बल्कि वह बीएमसी में सत्ता के समीकरण बदल भी सकती है। इतिहास खुद को दोहराता-सा लग रहा है। भाजपा-पुरानी शिवसेना ने विधानसभा चुनाव गठबंधन के साथ ही लड़ा था। गठबंधन के पक्ष में स्पष्ट बहुमत भी था, लेकिन उद्धव ठाकरे की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा इतनी प्रबल थी कि उन्होंने अढाई-अढाई साल के मुख्यमंत्री की मांग की। बल्कि पहला अवसर शिवसेना को देने का भी आग्रह किया। हालांकि भाजपा के 104 विधायक जीत कर आए थे और वह सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी। तत्कालीन शिवसेना के 55-56 विधायक ही थे। सत्ता हासिल करने के लिए राजनीतिक भूख यहां तक बढ़ी कि उद्धव ने कांग्रेस और संगठित एनसीपी के साथ ‘महाविकास अघाड़ी’ गठबंधन बनाया और मुख्यमंत्री बन गए। भाजपा ने एकनाथ शिंदे के जरिए न केवल शिवसेना को दोफाड़ किया, बल्कि उद्धव की सरकार भी गिरवा दी। लगभग उसी तरह अब उपमुख्यमंत्री शिंदे की शिवसेना के 29 पार्षदों को ‘ताज होटल’ में, गहरे पहरे के साथ, रखा गया है। पार्षदों में से ही आवाज उभरी है कि मुंबई का मेयर अढाई-अढाई साल का होना चाहिए। सियासत यहीं से आरंभ होती है। यदि शिवसेना किसी भी स्थिति में भाजपा के पंचसाला मेयर के लिए तैयार नहीं हुई, तो क्या शिंदे की शिवसेना घर-वापसी करते हुए उद्धव की शिवसेना के साथ कोई समझौता कर सकती है? हालांकि उद्धव का साफ कहना है कि जिन्होंने हमारी पार्टी तोड़ी थी, उनके लिए हमारे दरवाजे बिल्कुल बंद हैं, लेकिन उन्हीं के सांसद प्रवक्ता संजय राउत ने धमकी वाला बयान दिया है कि भाजपा-शिवसेना के बीएमसी में 4 पार्षद ही बहुमत से अधिक हैं, लिहाजा कभी भी तख्तापलट किया जा सकता है। हमारा मानना है कि शिंदे भाजपा के खिलाफ जाने का फिलहाल जोखिम नहीं उठाएंगे, क्योंकि भाजपा उनके इलाकों में भी ताकतवर बनकर उभरी है। दरअसल बीएमसी देश की सबसे अमीर महानगरपालिका है। बीएमसी की सत्ता भाजपा किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहेगी।

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