आज के नवा छत्तीसगढ़ म पंडवानी गायन ल एक बड़का विधा के रूप म देखे जाथे, माने जाथे अउ गाये घलोक जाथे। एकरे सेती आज एकर गायक-गायिका मनला पद्मश्री ले लेके कतकों अकन राष्ट्रीय अउ राज्य स्तर के सम्मान मिलत रहिथे। फेर ये बात ल कतका झन जानथें के ये विधा के जनमदाता कोन आय, ए विधा ल गावत कतका बछर बीत गये हे? आप मनला ये जान के सुखद आश्चर्य होही के नवा बने जिला बलौदाबाजार के गांव झीपन (रावन) के किसान मुडिय़ा राम वर्मा के सुपुत्र के रूप म जनमे नारायण प्रसाद वर्मा ला ये पंडवानी विधा के जनमदाता होय के गौरव प्राप्त हे। वोमन गीता प्रेस गोरखपुर ले छपे सबल सिंह चौहान के किताब ले प्रेरित होके वोला इहां के लोकगीत मन संग संझार-मिंझार के पंडवानी के रूप म विकसित करीन। मोला नारायण प्रसाद जी के झीपन वाला घर म जाये अउ उंकर चौथा पीढ़ी के सदस्य संतोष अउ नीलेश के संगे-संग एक झन गुरुजी ईनू राम वर्मा के संग गोठबात करे के अवसर मिले हे। ईनू राम जी ह नारायण प्रसाद जी के जम्मो लेखा-सरेखा ल सकेले के बड़ सुघ्घर बुता करत हवय। संग म गांव के आने सियान मन संग घलोक मोर भेंट होइस, जे मन नारायण प्रसाद जी ल, उंकर कार्यक्रम ल देखे-सुने हवयं। उन बताइन के धारमिक प्रवृत्ति के नारायण प्रसाद जी सबल सिंह चौहान के संगे-संग अउ आने लेखक मन के किताब मनके घलोक खूब अध्ययन करयं, अउ उन सबके निचोड़ ल लेके वोला अपन पंडवानी के प्रस्तुति म संघारंय।
पंडवानी शब्द के प्रचलन
नारायण प्रसाद जी ल लोगन भजनहा कहंय, ये हा ये बात के परमान आय के वो बखत तक पंडवानी शब्द के प्रचलन नइ हो पाये रिहिस हे। पंडवानी शब्द के प्रचलन उंकर मन के बाद म चालू होय होही। काबर के आज तो अइसन जम्मो गायक-गायिका मनला पंडवानी गायक के संगे-संग अलग-अलग शाखा के गायक-गायिका के रूप म चिन्हारी करे जाथे। जइसे कापालिक शैली के या फेर वेदमती शाखा के गायक-गायिका के रूप म। नारायण प्रसाद जी अपन संग म एक सहयोगी घलोक राखयं, जेला आज हमन रागी के रूप म जानथन। रागी के रूप म उंकरेच गांव के भुवन सिंह वर्मा जी उंकर संग म राहंय, जउन खंजेरी बजा के उनला संग देवयं। अउ नारायण प्रसाद जी तबूंरा अउ करताल बजा के पंडवानी के गायन करंय। उंकर कार्यक्रम ल देख के अउ कतकों मनखे वइसने गाये के उदिम करंय, एमा सरसेनी गांव के रामचंद वर्मा के नांव ल प्रमुखता के साथ बताये जाथे। फेर उनला वो लोकप्रियता नइ मिल पाइस जेन नारायण प्रसाद जी ला मिलिस।
रतिहा म गाये बर प्रतिबंध
नारायण प्रसाद जी के लोकप्रियता अतका जादा बाढ़हे रिहिस हवय के उनला देखे-सुने खातिर लोगन दुरिहा-दुरिहा ले आवंय। जिहां उंकर कार्यक्रम होवय आसपास के गांव मन म खलप उजर जावय। एकरे सेती चोरी-हारी करइया मन के चांदी हो जावय। जेन रतिहा उंकर कार्यक्रम होवय वो रतिहा वो गांव म या आसपास के गांव म चोरी-हारी जरूर होवय। एकरे सेती उनला रतिहा म कार्यक्रम दे खातिर प्रतिबंध के सामना घलोक करना परीस। एकरे सेती उन पुलिस वाला मनके कहे म सिरिफ दिन म कार्यक्रम दे बर लागिन। एक मजेदार घटना के सुरता गांव वाले मन आजो करथें। बताथें के महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र म उंकर कार्यक्रम चलत रिहिसे। उहों ले चोरी-हारी के शिकायत मिले लागिस। अंगरेज शासन के पुलिस वाले मन उनला ये कहिके थाना लेगें के वो ह कार्यक्रम के आड़ म खुद चोरी करवावत हे। बाद म असलियत ल जाने के बाद उनला छोड़ दिये गेइस। उन 18 दिन तक जेल (थाना) म रहिन, अउ पूरा 18 दिन उहाँ पंडवानी सुनाइन. तहाँ ले उनला छोड़ दिए गिस. जानबा राहय के उंकर पंडवानी के कार्यक्रम ह चारोंमुड़ा होवय, उन सबो डहर जावयं।
प्रशासनिक क्षमता
नारायण प्रसाद जी एक उच्चकोटि के कलाकार अउ सांस्कृतिक कार्यक्रम के पुरोधा होय के संगे-संग प्रशासनिक क्षमता रखने वाला मनखे घलोक रिहिन हें। उन अपन जिनगी के अखिरी सांस तक गांव पटेल के जिमेदारी ल निभावत रिहिन हें। एकर संगे-संग गांव म अउ कुछु भी बुता होवय त अगुवा के रूप म उन हमेशा आगू रहंय।
लगातार 18 दिन तक कथापाठ
अइसे कहे जाथे के पंडवानी या महाभारत के कथा ल लगातार 18 दिन तक नइ करे जाय। एला जीवन के आखिरी घटना के संग जोड़े जाथे। फेर नारायण प्रसाद जी ये धारणा ल झूठलावत अपन जिनगी म दू पइत ले 18-18 दिन तक पंडवानी के गायन करीन हें। एक पइत जब उन शारीरिक रूप ले बने सांगर-मोंगर रिहिन हें, तब पूरा बाजा-गाजा के संग करे रिहिन हें, अउ दूसरइया बखत जब उंकर शरीर उमर के संग कमजोर परे ले धर लिये रिहिस हे, तब बिना संगीत के सिरिफ एकर वाचन भर करे रिहिन हें। अइसे बताये जाथे के पहिली बखत जब उन 18 दिन तक पंडवानी के गायन करे रिहिन हवयं तब ये अफवाह फैल गे रिहिस हावय के ये 18 दिन के गायन के तुरते बाद उन समाधि ले लेहीं, एकरे सेती उन 18 दिन तक गायन करत हावंय। काबर ते अइसन गायन ल जीवन के अंतिम समय के घटना संग जोड़े के बात जनमानस म रिहिस हे। एकरे सेती उनला देखे के नाम से चारोंमुड़ा ले जनसैलाब उमड़ परे रिहिस हे। दूसरइया बखत जब उन 18 दिन तक पंडवानी के गायन करीन तेकर बाद उन खुदेच जादा दिन तक जी नइ पाइन, कुछ दिन के बाद ही उन ये नश्वर दुनिया ल छोड़ के सरग सिधार देइन।
मठ अउ जनआस्था
हमर समाज म अइसे चलन हवय के घर-गिरहस्ती के जिनगी जीने वाला मनके देंह छोंड़े के बाद उनला मरघट्टी म लेग के आखिरी क्रिया-करम कर दिये जाथे। फेर नारायण प्रसाद जी के संग अइसन नइ होइस । उनला मरघट्टी लेगे के बदला गांव के तरिया पार म मठ बना के ठउर दे गइस। अउ सिरिफ अतकेच भर नहीं उनला आने गांव-देंवता मन संग संघार लिये गइस। अब गांव म जब कभू तिहार-बार होथे त गांंव वाले मन आने देवी-देवता मन के संग म उंकरो मठ म दीया-बत्ती करथें, अउ उंकर ले गांव अउ घर खातिर सुख-समृद्धि मांगथें। अइसे कहे जाथे के सन् 1972 म 4 दिसंबर के जब उन सरग सिधारीन तब उंकर उमर करीब 80 बछर के रिहिस हवय, वइसे उंकर जनम के बछर ल 1884 बताए जाथे। सियान मन बताथें के तिंवरा लुवई के बखत उन सरग लोक वासी होइन.
पारिवारिक स्थिति
नारायण प्रसाद जी के वंशवृक्ष के संबंध म जेन जानकारी मिले हे तेकर मुताबिक उंकर सियान के नांव मुडिय़ा राम वर्मा रिहिस हे। फेर नारायण प्रसाद जी, नारायण जी के बेटा होइस घनश्याम जी, अउ घनश्याम जी के बेटा होइस पदुम जी। पदुम जी के दू झन बेटा हवयं संतोष अउ निलेश जउन मन अभी घर के देखरेख करत हवंय। इहां ये बताना जरूरी लागथे के नारायण प्रसाद जी के बेटा घनश्याम घलोक ह अपन सियान सहीं कथा वाचन करे के कोशिश करयं, फेर उन बिना संगीत के अइसन करंय। उंकर बाद के पीढ़ी म पंडवानी गायन या वाचन डहर कोनो किसम के झुकाव देखे ले नइ मिलिस। आज उंकर चौथा पीढ़ी के रूप म संतोष अउ निलेश हवंय, फेर इंकर पूरा बेरा सिरिफ खेती किसानी तक ही सीमित हे। एकरे सेती हमला नारायण प्रसाद जी के संबंध म वतका जानकारी नइ मिल पाइस, जतका मिलना रिहिस हे। कहूं उंकर वारिस मन घलोक ये रस्ता के रेंगइया रहितीन या लिखने-पढऩे वाला होतीन त पंडवानी के ये आदिगुरु आज लोगन के बीच अनचिन्हार बरोबर नइ रहितीन, पूरा देश-दुनिया म उंकर सोर-खबर रहितीस।
सुशील भोले

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